मैं राजहंस हूँ। आपसे ये कहना है कि सोचना कोई बीमारी नहीं है। ये एक तरह की व्यस्तता है। लोग श्रम करते हुए शरीर से, सोचने वाले उसी तरह, दिमाग़ से मजबूत हो जाते हैं। हर एक बिम्ब के समांतर, दर्पण के आयाम में, एक प्रतिबिम्ब चलता है। अगर वो एक, एक नहीं तो कम से कम, एक और एक के सापेक्ष तो जरूर समझ आ जाते हैं। दुनिया एक नियम से चलती है, पागल चलाते तो मुश्किल था, लेकिन दिमाग़ वाले चलाते हैं, इसलिए सोचते हुए आप एक दिन उनके जूते में पैर उतार पाते हैं। सब कुछ का एक पैटर्न और नियम है, ऊँची दीवार पर लिखा हो या ऊँची आवाज में मंच से क्यों न बोला जाये पर ठहरकर देखिए आप भी, संभवतः आपको भी कुछ दिखा हो!