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केसरिया भारत: राष्ट्रीयता के पक्के रंगकेसरिया भारत: राष्ट्रीयता के पक्के रंग
आनंद

आँख का अंधा नाम नयनसुख! मैं आनंद हूँ! क्या था और आज क्या हो गया...प्यार ही तो किया था कोई दंगा नहीं... दिल टूटकर टेलकम पाउडर बन गया, शरीर व्याधियों का घर है...दुख है, भवसागर है, कड़ाके की शीतलहर में ओढ़ी फटी हुई चादर है! ये दुनिया बड़ी ... प्यार करने वाले के पास पहले तो एक फ्लावर होता है, फिर एक और हो जाता है। प्यार जहर का स्वाद है और जिसे आप भावुकता कहते हैं, वो तो साक्षात जंगल की आग है। अंत में आपको पता चलेगा लोग आपसे नहीं है और आप ब्रह्मांड में पृथ्वी की तरह अकेले हैं, इर्द-गिर्द सिर्फ विलास है, जूठा खाना है, मीठा जहर या सड़ा हुआ मांस है।

दुख के कारोबार

बटुक जी

मेरा नाम बटुक है, सारे ग़लत काम करता हूँ, जैसे सच बोलना, जनेऊ पहनना, शिखा रखना, संस्कार बरतना। मेरा मानना है कि दूषित बुद्धि और मंद संस्कार वाले लोगों ने संसार का बंटाधार कर दिया है। देश कोई कंपनी और धर्म किसी व्यवस्था का दास नहीं है, अध्यात्म वाग्विलास या टाईमपास नहीं है। धर्म धंधा है लेकिन सिर्फ धंधा नहीं, ये धंधों का धंधा है, इसके बिना सभ्यता निरुद्यम और कादरों का अड्डा है। धर्म ही साध्य, साधक, साधन और साधना है, धर्म सुख नहीं, सुखातीत है, सुखों के ठेकेदार, बस इसी बात से भयभीत हैं।

किस्सा-ए-भौजाई

राजहंस

मैं राजहंस हूँ। आपसे ये कहना है कि सोचना कोई बीमारी नहीं है। ये एक तरह की व्यस्तता है। लोग श्रम करते हुए शरीर से, सोचने वाले उसी तरह, दिमाग़ से मजबूत हो जाते हैं। हर एक बिम्ब के समांतर, दर्पण के आयाम में, एक प्रतिबिम्ब चलता है। अगर वो एक, एक नहीं तो कम से कम, एक और एक के सापेक्ष तो जरूर समझ आ जाते हैं। दुनिया एक नियम से चलती है, पागल चलाते तो मुश्किल था, लेकिन दिमाग़ वाले चलाते हैं, इसलिए सोचते हुए आप एक दिन उनके जूते में पैर उतार पाते हैं। सब कुछ का एक पैटर्न और नियम है, ऊँची दीवार पर लिखा हो या ऊँची आवाज में मंच से क्यों न बोला जाये पर ठहरकर देखिए आप भी, संभवतः आपको भी कुछ दिखा हो!

सीता-हरण के पूर्व

लेखक महोदय

मै लेखक हूँ। असल में तो ये बात है कि लिखना कृत्रिम है। बोलना स्वाभाविक है। किंतु बोली बात दूसरों की छोड़िए, खुद ही भूल जाता था, इसलिए लिखना जरूरी हो गया। एक और बात है, लिखा हुआ चूंकि रह जाता है, इसलिए इंसान जो बकता है, वो थोड़ा मेकअप करके लिखता है। कुछ भी लिखा जा सकता है, दुनिया में न कोई घटना, न कुछ फटना, न कुछ लटकना, लेखनातीत है। कलम तलवार नहीं होती, कलम अंधे की लाठी है, लोग उपयोग करते हैं, जिसको जैसी समझ आती है। कागज और कलम बनाने वाले लंबा जियें, उन्होंने पहली बार समय को फ्रीज करने की मशीन बनाई है।

दिव्य धुलाई यंत्र

बबा जी

मैं बाबा जी, कुशलतः कुशलता की कामना करता हूँ, ठीक वैसे ही जैसे, अच्छा अच्छे की, बुरा बुरे की कामना करता है। कुछ नहीं रहेगा, यहाँ का वहाँ क्या, यहाँ का यहाँ भी नहीं रहेगा। आज बेचकर खाओगे, कल भूख से मर जाओगे! बुराई से बुराई जन्मती है, बाँकी सब भ्रम है, थोड़ा वक्र, थोड़ा चक्र, ये तत्र, वो यत्र…किसी बुरे के साथ बुरा करके, उसके कर्म हल्के और ख़ुद के भारी न करें! चार कंधों पर चढ़ने के लिए, अधर्म की सवारी न करें!

नेता जी युद्ध भूमि पर

ताऊ

कुछ बच्चों का ताऊ हूँ। सत्तर साल से खटिया तोड़ रहा हूँ, खटिए पर हूँ सो सबको शक्ल, अकल और बकल सप्लाई कर रहा हूँ। कायदे में रहोगे तो प्रत्यक्ष फायदे में रहोगे, खटिया खड़ी करने की सोची तो हमने अपनी तेलप्यारी आपके पिछवाड़े में कोची! सब कुछ नियम से होगा...संयम से होगा... गाँव बड़ा है, बुजुर्ग जरूरी हैं, खासकर कि वो जिन्होंने अपनी खटिया तोड़ी हैं। हमें गाँव का आदर्शों का गाँव बनाना है, बाहर बड़ा खराब जमाना है।

फिशिंग

मुर्दा मर्द

मैं मर्द हूँ, पहले ज़िंदा था, अब मर गया, मुर्दा हूँ, लिहाज़ा आप कह सकते हैं कि मैं मुर्दा मर्द हूँ। दुनिया ने कहा कि मेरा मरना जरूरी है, इसके बिना उसका उद्धार नहीं होगा! दधीचि की अस्थियों से वज्र बना, मेरे पिंजर से देश-दुनिया और प्रियजनों का घर बना। मेरे सीने पर लोग खड़े हुए, फिर उनको फील-गुड हुआ, फिर मुझे कभी खड़ा होने ही नहीं दिया गया। मेरी गेंद तोड़कर बीसियों छर्रे बनाए गए हैं, लोग गुलाबी कार्ड दिखाकर कैस भुना रहे हैं और हम ऊपर से नीचे लाल सुजाये गए हैं।

लड़कियाँ लड़ने का पर्याय

नेताजी

मैं सेवक हूँ, जन्म से ही...एक बार की बात है, सेवा करते हुए एक युगल के घर, असंख्य और सेवाओं को करने के लिए साक्षात् सेवा के आने का योग बना...सबने जन्म लेते ही कहा, सेवा हुआ है! कोई सेब का 'से' भी बोले तो वो सेवक प्रकट हो जाता है। दुनिया और दुनियादारी सब छोड़कर सेवा की...सेवा करते हुए कभी अगर 'व' के बाद वाली मात्रा बची, तो उसी से संतोष कर लिया। आज तक इतनी सेवा की है, तभी पृथ्वी सूर्य के चक्कर, कम से कम पांच हजार साल बाद भी लगा पा रही है। सेवा ही धर्म है, सेवा ही कर्म है, सेवा में ही अस्तित्व का मर्म है।

खानदानी लिबास

बकील साब

हम सबकी वकालत करते हैं, इसलिए हमारा नाम वकील पड़ा, कुर्सी पर बैठे हैं, इसलिए खड़े लोग हमें साहब बोलते हैं। देखिए, विरली चीज ही ऊपर जाती है, ऊपर जाना एक गुण तो होगा ही! आप भी बोलते हैं, हम भी, लेकिन ये जीभ का करतब है। बालक में बाल देखना, रुमाल में रूह देखना और फिर बालक के रूमाल को रूह के बाल के सापेक्ष रखने पर बालक की रूह और रुमाल में लिपटे बाल खोज लेना राष्ट्रीय टैलेंट है। इसी टैलेंट से साहब कहलाते हैं।

सुपर बच्चा

CEO Saab

नमस्ते, मै CEO साहब हूँ। एक साईट बनाकर गलती की, कुछ अजीबोगरीब प्राणियों के हाथ में कलम पकड़ाई और नतीजा सामने है। खेत खाए ये लोग और लोग पानी पी - पीकर गालियाँ मुझे देते हैं। साईट मेरी इज्जत, मेरे ज्ञान की तरह ही मुफ्त है। खुद भी कभी कभार लिख देता हूँ, ज्यादातर तो माफी मांगते ही दिन गुजरते हैं। अकेला डालमिया कानेगा कि कब्र खानेगा...दोनों कर रहा हूँ। आप मुझसे संवेदना व्यक्त कर सकते हैं!

Thought Of The Year

फिल्मी मीठा

मैं फ़िल्मी हूँ, पर मीठा मत बोलिये! मैं एक पहचान में बंधकर नहीं जीना चाहता। मैं खट्टा, तीता, कड़ुआ, नमकीन सब होकर जीना चाहता हूँ! इस दुनिया को प्यार चाहिए, इश्क़ चाहिए, हर फ़्लेवर का, हर दिशा, हर द्वार से, बीच मड़ैया, गोल गढ़ैया, भीतर तक उतार के। जब दुनिया में हर जगह प्यार होगा, तभी नीचे और उपरवाले का, आगे और पीछे वाले का, अगल और बगल वाले का, पाईप और टनल वाले का उद्धार होगा! प्यार का प जब तक न निकले, मुहब्बत के, म के मुँह में न उतरे, तब तक चैन न मिले, मेरा क़ातिल मुझे क़त्ल न करे, ऐसी कोई रेन न मिले!

असर

सख्त नारी

ये शक्त नारी हैं। ये इतनी शक्त हो गईं कि इनकी हिंदी कमजोर हो गई...इन्होंने अपनी डिटेल सख्त नारी लिख दी है। ये बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करती हैं..मतलब बहुराष्ट्रीय कंपनी में जो भी काम होता है, ये सब करती हैं। ये सब करके इन्हें स्वाबलंबन, स्वतंत्रता, स्वाधीनता, सुख, समृद्धि सब मिलते हैं। इन सुविधाओं का समुचित लाभ ये रात आठ बजे से लेकर सुबह दो बजे तक लिया करती हैं। इन्होंने काम के सामने काम और काम के बाद फिर काम और काम पर काम को वरीयता देकर खुद पर लगा कामिनी का टैग हटाकर कामवाली का तमगा ले लिया है। इनके लिए नाकाम होना, न होने से भी ज्यादा दुखद है।

मिस टेक

छम्मक-छल्लो

इनको लोग ईर्ष्या से, असुरक्षा से, दुर्भावना से छम्मक-छल्लो बोलते हैं, ये सब सिर्फ इसलिए सहन करती हैं कि कम से कम बाप के दिए नाम से तो मुक्ति मिली। ओपिनियन रखती हैं, तो लोगों की क्यों सुलगती है? बराबर का हक चाहिए, आजाद पंछी हैं, खुली सरहद चाहिए। सही गलत का भेद पूर्वाग्रह है, बंधन है, हर पीली चीज उपयोग करती हैं, हो सकता है, सोना या चंदन है। इनका मानना है कि ये योग नहीं, प्रयोग का काल है। इनकी सेवा करेंगे तो हर सुविधा फ्री है और अगर प्रश्न किया तो फिर धारा तीन, तेरह से चार सौ बीस तक, साथ ही उपधाराएं ए, बी और सी फॉर सी हैं।

कंफ्यूजन

दादा

हमारा नाम दादा है, जन्म लेने से पहले ही हम दादा बन चुके थे। फिर धरती पर आकर हमने खूब दादागिरी की। मेरे पिताजी को मूढ़ी खाने का और माता को चाय पीने का शौक था। हमने भी दाँये हाथ से चाय पी और बाँये हाथ से मूढ़ी खायी। फिर लगा कि मूढ़ी में स्मेल है! हाथ बोदलू कैसे? हमने मूढ़ी फेंकी और उसी हाथ से धू-धू करना शुरू किया। अब हमने सब फेंक दिया, एक हाथ से चश्मा पकड़ा और दूसरे हाथ में अखबार…फोटो खिंचा रहे हैं!

चाय पर गप शप

डाक साहेब

ये डाक साहेब हैं। एक बार इन्होंने एक सुस्त मेढक पकड़ा..ब्लेड से ये उसका उदर खोलकर उसकी सुस्ती दूर ही करने वाले थे कि पीछे से माता जी का चप्पल उड़ता आया और सीधे शाबाशी स्वरूप उनकी गर्दन पर पड़ा। ब्लेड बहक-कर अपनी उंगली पर चल गया। जब तक ये रांड़ रुदन करके संयत होते, मेढक जी अपना पेट लेकर चंपत हो लिए। उनका ये जलवा देखकर इन्हें बड़ा संतोष हुआ। इनकी उंगली का जो भी हो पर मेढक की सुस्ती का सस्ता इलाज हो गया..तभी से ये और दुनिया इनमें डॉक्टर-स्वरूप देखती है।

नाम इच्छानुसार

प्रस्तुति एवं COPYRIGHT © 2022 MRITYUNJAY MISHRA