जब हमने जन्म लिया तो बड़े असाधारण इंसान बनकर पैदा हुए। हमारे माता पिता ने इसी कारण, हमारा नाम रखा, सुपर। जैसा नाम, वैसा गुण।
एक बार हमारे मन में जिज्ञासा आई, हमने शोध करने की सोची कि बच्चा कैसे होता है! बोले तो, हम कैसे हुए? हमने माता से प्रश्न किया। माता ने उत्तर नहीं दिया, पहले लजाई फिर बोली, ” चलो, सूसू करके आओ, वरना बिस्तर गीली कर दोगे!” हम सूसू से निवृत होकर आए, किडनी शांत हो गई पर जिज्ञासा शांत नहीं हुई। हमने पिता से पूछा। पिता बिफर गए,”करोगे परेशान! एक तो दिन भर दफ्तर…फिर घर में…” हम समझ गए, आगे यही होना था। पिता बोले, “निकालो किताब! पढ़ाई करो।” बताते चलें कि हमें पढ़ाई से बड़ी अरुचि थी। हम बोल सकते हैं, पढ़ने और लिखने का हमारा मूड नहीं होता है। हमारी बोली बात अगर किसी को अच्छी लगे तो वो हमें ही लिख – पढ़ ले, हम कोई आपत्ति नहीं करेंगे।
फिर हमने अपनी दीदी से पूछा, वो कैसे हुई, हम कैसे हुए, अगर कोई और होने को हो, तो वो कैसे होगा! दीदी थीं बड़ी ज्ञानी! उसने कहा, “शादी से बच्चे होते हैं।” ओह! अब समझ आया। मतलब मम्मी और पापा की भी शादी हुई होगी, तभी तो हम हुए!
फिर हम काफी दिन इसी ज्ञान पर चले, शादी हुई तो बच्चे होते हैं । मतलब शादी नहीं हुई तो कुछ हो जाए पर बच्चे नहीं होंगे। शादी बच्चा पैदा करने की प्रक्रिया है…अब चूंकि हमारे भीतर साइंटिफिक टेंपर बहुत ज्यादा था इसलिए प्रक्रिया शब्द पर विचार अटक गए।
शादी होते ही बच्चा हो जाता है! दीदी से फिर पूछा। दीदी ने अपनी जानकारी खोदी, कहा, ” मम्मी पापा इसके बाद बाजार जाते हैं। जो बच्चा मम्मी पसंद करती है, पापा पैसे देकर उसे खरीद लेते हैं। फिर दोनों घर आ जाते हैं बच्चा लेकर। जिस दिन वो घर आ जाते हैं, उस दिन बच्चे का जन्मदिन मनाया जाता है।”
अब थोड़ा और क्लियर हुआ। पापा ने पैसा दिया, मम्मी ने बच्चा लिया और फिर हम बड़े हो गए। अगर पापा पैसा नहीं देंगे तो मम्मी बच्चा कैसे खरीदती? दोनों का होना जरूरी है।
अब चूंकि हमारे भीतर साइंटिफिक टेंपर ज्यादा था…कहिए कि कक्षा नौ और दस की जीवविज्ञान की किताब पढ़नी पड़ी तब हमें ज्ञान हुआ कि बाजार का मतलब थोड़ा सा अलग है, हालांकि बच्चे के लिए बाजार की आवश्यकता रही है और रहेगी ही। बच्चे से बाजार के संबंध की वैज्ञानिकता और वैधानिकता हमारे नाम की तरह सुपर है और सबसे ऊपर है।















