ये डाक साहेब हैं। एक बार इन्होंने एक सुस्त मेढक पकड़ा..ब्लेड से ये उसका उदर खोलकर उसकी सुस्ती दूर ही करने वाले थे कि पीछे से माता जी का चप्पल उड़ता आया और सीधे शाबाशी स्वरूप उनकी गर्दन पर पड़ा। ब्लेड बहक-कर अपनी उंगली पर चल गया। जब तक ये रांड़ रुदन करके संयत होते, मेढक जी अपना पेट लेकर चंपत हो लिए। उनका ये जलवा देखकर इन्हें बड़ा संतोष हुआ। इनकी उंगली का जो भी हो पर मेढक की सुस्ती का सस्ता इलाज हो गया..तभी से ये और दुनिया इनमें डॉक्टर-स्वरूप देखती है।