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केसरिया भारत: राष्ट्रीयता के पक्के रंगकेसरिया भारत: राष्ट्रीयता के पक्के रंग

चर्चा में

किस्सा-ए-भौजाई

युद्ध लड़ ही लिया जाए। ध्वनि मत से युद्ध जीत भी लिया गया है। थई थई कर दी हमने उनकी, इतना शोर किया, इतना चिल्लाए कि बस बोलती बंद कर दी सबकी। अब मैदान में जाएंगे कि झंडा गाड़ना है और फोटो खिंचवानी है।

भाई ने कहा कि अब बस! युद्ध लड़ ही लिया जाए। ध्वनि मत से युद्ध जीत भी लिया गया है। थई थई कर दी हमने उनकी, इतना शोर किया, इतना चिल्लाए कि बस बोलती बंद कर दी सबकी। अब मैदान में जाएंगे कि झंडा गाड़ना है और फोटो खिंचवानी है।

हमने पूछा कि किस को लेकर जाओगे युद्ध लड़ने!

दफ्तर के लोगों में बिजनस खींचने को लेकर हाहाकार है, इनसेंटिव की मार-धाड़ है। प्रमोशन की उठा पटक है, हरास होने न होने की सनक और यथोचित सेवा न मिलने की कसक है। वहाँ से तो कोई तुम्हारी शवयात्रा में नहीं जाएगा, युद्ध भूमि तो भूल ही जाओ।

समाज अब गधे की सींग है, जो होनी तो चाहिए थी पर मिलती नहीं, और अगर मिल भी जाए तो, वो वही है, इसपर भरोसा न करने की सलाह है। पर जब थी ही तब ही क्या थी? उसका इतिहास अगर बाएं हाथ से संतरे खाते हुए भी पढ़ें तो लगेगा कि समाज खुद ही युद्धभूमि थी, जिसमें रक्त कभी न बहा हो पर एक – दो चीजें बही थी…छोड़िए ये सब।

बड़ा परिवार! अब केवल जन्म, मृत्यु और इनके सम्मेलन, विवाह पर मिला करते हैं। ये युद्ध लड़ने नहीं आ पाएंगे, इनको छुट्टी नहीं मिलती। छुट्टी मिलती है तो इस तरह कि उतने शॉर्ट नोटिस के हिसाब से ट्रेन की टिकट नहीं मिलती। सब कुछ मिल जाए पर, साली वजह नहीं मिलती। आप भी तो उनकी वजह पर उनके लिए नहीं पहुंचे थे! अब लड़िये अपनी लड़ाई खुद।

आस – पड़ोस कतई नहीं। मर जाते हैं लोग, मालूम नहीं चलता। महकते हैं तब ध्यान आता है। महक बढ़ जाती है तब निदान होता है। दूर दराज से आए, अस्थाई लोग हैं। कमाते हैं, घर जाते हैं, जीते हैं, फिर कमाने आते हैं। इनको युद्ध नहीं लड़ना, दूसरे के लिए तो छोड़िए, खुद के लिए भी नहीं। बोला न कि जब तक गंध असहनीय न हो जाए इन्हें कुछ बोलने में अपराध भाव होता है, इन्हें लगता है कि जिसके घर की गंध है वो सह रहा है तो फिर वो तो दूसरी दीवार के पार हैं। बात जब कन्फर्म हो जाती है तब गंध के पीछे दीवार लांघते हैं और वो भी सरकारी कर्मचारियों के पीछे से।

परिवार। न्यूक्लियर वाला। कॉम्प्लिकेटेड हो गए यहाँ भी। पति को दफ्तर, पत्नी को मॉल जाना है। बेटे को संतरा चाहिए, बेटी को केला। पिता को फेसबुक, माँ को यू ट्यूब। सबके पास अपने अपने खाते, अपना बैलेंस, अपने लाइक कमेंट्स, अपने फैन, फॉलोअर। अपनी शक्ति, अपना अखाड़ा, अपनी खूंटी, अपना बाड़ा। सबके पास अपने मुद्दे, अपने एजेंडे, अपने नैरेटिव, अपने नेता है, सबकी अपनी सुविधा है, सबकी अपनी सेवा है, उनके विक्रेता व क्रेता हैं। अब कॉमन मिनिमम एजेंडा बनाइए और जाइए, लड़ आइए।

अकेले! किस हाथ से लड़ेंगे? बांए हाथ से, थोड़े कम बांए हाथ से, एकदम कम बांए हाथ से, दाएं हाथ से, थोड़े कम …

कवच कहाँ पहनेंगे? सर पर? पैर पर? छाती पर? जांघ पर?

बैल पर जाएंगे? घोड़े पर?

घोड़ा या घोड़ी?

वो विरोधी गधे/गधी पर लड़ने आ रहे हैं। घोड़े और गधे का डीएनए एक है! आपका घोड़ा/घोड़ी, उनका गधा/गधी एक दूसरे के साथ प्रणयक्रीड़ा के इच्छुक हो सकते हैं तो फिर आप क्यों नहीं!

लड़ाई खत्म!

इतनी बड़ी लड़ाई, इतनी आसानी से निपटाई!

ये है, हमरी भौजाई, हमर बिना पेट वाली माई!

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प्रस्तुति एवं COPYRIGHT © 2022 MRITYUNJAY MISHRA