मेरा नाम बटुक है, सारे ग़लत काम करता हूँ, जैसे सच बोलना, जनेऊ पहनना, शिखा रखना, संस्कार बरतना। मेरा मानना है कि दूषित बुद्धि और मंद संस्कार वाले लोगों ने संसार का बंटाधार कर दिया है। देश कोई कंपनी और धर्म किसी व्यवस्था का दास नहीं है, अध्यात्म वाग्विलास या टाईमपास नहीं है। धर्म धंधा है लेकिन सिर्फ धंधा नहीं, ये धंधों का धंधा है, इसके बिना सभ्यता निरुद्यम और कादरों का अड्डा है।
धर्म ही साध्य, साधक, साधन और साधना है, धर्म सुख नहीं, सुखातीत है, सुखों के ठेकेदार, बस इसी बात से भयभीत हैं।