जेन जी-डी-पी

आहार का प्रचार

…आज फैक्ट्री का शटर खुल गया है, बकरियाँ…होंगी कहीं! ओह! ये फोटो गलत लग गई है! ठीक है! बाद में बदल दी जाएगी। इस तस्वीर में सिर्फ भेड़-बकरियां नजर आएगी।

ये क्या होता है? बैगन-टेरियन! हमने शाकाहारी सुना, मांसाहारी सुना, सर्वाहारी सुना और यहाँ तक कि निराहारी भी सुना पर ये बैगनहारी?

जब आप ध्यान से देखियेगा तो पाइएगा कि शाकाहार के पीछे कोई एलर्जी जैसा कारण नहीं होता, ज्यादातर ये श्रेष्ठताबोध होता है! ऐसा नहीं है कि शाकाहारी मच्छर नहीं मारते, चींटियाँ, चूहे या सड़क चलते कुत्ते को ढेले नहीं मारते! लेकिन शाकाहार के पीछे जो सबसे बड़ा कारण पाया गया है, वो है दया! लोगों को जानवरों के आंसू नहीं देखे जाते…

मांसाहारी को आहार के आगे पीछे ज्यादा कुछ सूझता नहीं है। उसे दया धरम कम होती है, वो बेचारा तो पहले से बदनाम है, पानी, हवा, धरती पर बिखरा बहुत कुछ खाने का लजीज सामान है।

मांसाहारियों ने लक्ष्य किया कि शाकाहारी का सबसे लजीज,लग्जरी वाला शौक है पनीर, दूध, दही, घी, मक्खन और ऐसे ही उनके भोग छप्पन! उन्हें लगा कि ये होते हुए उनकी दावत, ‘ चोलबे न!’

ये शाकाहारी लोग तो अपन का शिकार पाल रहा है! फिर घास खाने का गुमान भी है और आंसू न बहाने से मिलने वाली उपाधि, मतलब महानों में महान भी है! इसका बंदोबस्त करना पड़ेगा।

उन्होंने एक एलर्जी वाली पार्टी पकड़ी। दया वाली लाठी पकड़ी, गुमान वाली परिपाटी पकड़ी और एक पोस्टर बनाया, बैंगनहारी।

‘ ये ससुरे बैगनहारी हैं! शाकाहारी तो अत्याचारी हैं…वैसे तो हम भी हैं, पर ये खतरनाक स्लीपर सेल वाले हैं। खा भी लेते हैं, बेचारे बेजुबानों को रुला भी लेते हैं और महान होने का इनाम भी पा लेते हैं। ये बैगनहारी ज्यादा अजीब हैं। इनका बस चले तो ये अपना खाना, अपने पेट में भी न रखें, फोटोसिंथेसिस करके काम चला लें पर साला, क्रोलोफिल कहाँ से लाएंगे!’ उस मांसभक्षी ने बैगनहारी को कहा, ‘बोल बे!’

बैगनहारी बोला, ‘ जो चमड़े से बाहर आए, वो दर्द अपन कैसे खाये!’

शाकाहारियों में बड़ी खलबली मच गई। उन्हें मालूम चला कि दुनिया में उनसे भी ज्यादा कोई दयावान, क्षमावान और सभ्य आ गया है। उन्होंने आपस में बात की, इसकी पोल खोली जाए, ये मांसाहारी की बी टीम है।

शास्त्रार्थ हुआ। फोकस था, शरीर। बैगनहारी ने सिक्सर मारी, नाक से, कान से, गुदे से, गुर्दे से, सबसे निकलती है गंदगी। कैसे खाओगे? शाकाहारी बोले कि बात खाद्य की हो। एक एगी-टेरी खड़ा हुआ। वैगन ने कहा कि वो अजन्मे बच्चे को खाने वाले से बात नहीं करता। पनीर वाला खड़ा हुआ जैसे कि बैगनहारी चिल्लाया, बैठ चटोरे! चुप बैठ! दही खाने वाला कुछ कहने को हुआ कि बैगन ने अपनी हवाईचप्पल फेंकी, तू तो सामूहिक संहार करता है!

अंत में डरते- डरते दूध पीने वाला खड़ा हुआ! बैगन ने घृणा से उसे देखा, अरे चार पांव के अधिकार को हड़पने वाले, जा पड़ोस वाली बकरी से सहमति माँग और फिर बकरी के बच्चे का हिस्सा छान! दूध पीने वाले ने अपनी बांह में पकड़े बच्चे की तरफ दिखाया!

नहीं, वो भी नहीं! बैगनहारी चिल्लाया। बड़ी ग़ज़ब की बात है, शाकाहारी चार चित्त, बैगनहारी अजित! इसके बाद बैगनहार का बड़ा प्रचार हुआ। शाकाहारी के आहार का एक हिस्सा बेकार हुआ और कुछ लोग जो इस वैगनहार को आत्मसात न कर पाए, जले-कुढ़े मांसाहार की तरफ चले आए।

शाकाहार न घर के रहे, न घाट के। न दयावान रहे, न सभ्य और महान रहे और न तो मस्तीखोर इंसान रहे। बैगनहारी को पास से देखने के बाद कई लोगों को लगा कि ये कोई दर्शन या गणित या फलित चीज नहीं है, ये कोरी मानसिक है। अब जो लोग बैगनहार पर न टिक पाए, वो फिर लौटकर शाकाहार की तरफ न गए, वो मांसाहारी हो गए। फिर पूरी दुनिया या तो मांसाहारी हो गई या बैगनहारी। अब, सिर्फ आहारी ही नहीं, आहार भी प्रभावित हुआ।

जब बकरियां दूध के अभिशाप से मुक्त हुई तो दुनिया के सम्मुख हुई। वो कभी रात के बारह बजे मेमियाती तो कभी नए नए जहरीले पत्ते खातीं। कोई जंगल जातीं तो कोई शहर घूम आतीं। कोई इंसानों को उनकी पुरानी भूलों के लिए हूल देती तो कोई पूंछ में फूल बांध कर गर्व से फूल लेती। शुरू शुरू में तो सब बड़ा अच्छा रहा। जज्बा बड़ा पक्का रहा। फिर एक बार गाँव के बाहर एक फैक्ट्री खुली…

फैक्ट्री की मशीनों को चलाने के लिए बकरियों का दूध लगता था। कुछ मशीनें ऐसी थीं जिनमें बकरियों को जोरा जाता था और जब तक बकरियाँ चलतीं, मशीन चलती…फिर पता चला कि फैक्ट्री तो चौबीस घंटे खुली रहेगी! बकरियों के अपशिष्ट मशीन में स्नेहक का काम करते हैं…इतना सब तो ठीक था पर फिर सुनने में आया कि फैक्ट्री के मालिक और मैनेजर जिस देश से आए थे वो हर एक टारगेट पूरा होने पर मटन बिरयानी विथ मटन करी जरूर खाते थे।

अबे, ये तो मांसाहारी लोग आ गए यार! गाँव के बैगनहारी लोग, जो कि पूर्व में शाकाहारी थे, उन्होंने राय ली, विमर्श किया! इनसे तो उनका स्वाभाविक वैर है। इन छुट्टे सांड बनी बकरियों से वैर है, ऐसे में वो मांसाहारी ही कौन से गैर हैं। दूसरे के फट्टे में हम क्यों टाँग अड़ाए! जिनका  इंटरेस्ट है, वही खुद निपटाएं। वैगनगारी लोग अपने अपने घर चले गए!

…आज फैक्ट्री का शटर खुल गया है, बकरियाँ…होंगी कहीं! ओह! ये फोटो गलत लग गई है! ठीक है! बाद में बदल दी जाएगी। इस तस्वीर में सिर्फ भेड़ बकरियां नजर आएगी।

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