एक विचारक कह गए कि जनता की दो इच्छाएं होती हैं…एक सिनेमा देखना और दूसरा विद्यालय जाना! वो विद्यालय और वहां जाती ट्रेन की टिकट छोड़ गंड-फटान मूवी देख आए तो वो फिल्मी मीठा है और यदि बिना टिकट लिए विद्या पाए और फिर टिकट के पैसे से मूवी देख आए तो हमारा ताऊ है। यदि वो बिना टिकट लिए ट्रेन पर बैठे भी, लोगों की सीट से उतारकर उनको धोचे भी, विद्यालय पहुंच मोटिवेशन दे आए और इन्वेस्टमेंट जुटाकर पूरा हॉल बुक करके मूवी हिट कराए…और फिर गंड-फटान के कलाकारों के साथ चाय भी पी आए तो वो हमारे CEO साब हैं। यदि वो टिकट ना ले, पर बिल बनाए, विद्यालय न पहुंचे पर परीक्षा पास हो जाए, मूवी हाल में देखने की जगह मूवी को ही घर डिनर पर बुलाये तो वो हमारे नेताजी हैं। वो जो रेलवे ट्रैक पर पैदल विद्यालय जा रहा है, वो पासार्थी है, वो कोचिंग की फीस बचा रहा है!
पहली बार जब विद्यार्थी को लगा कि वो स्कूल जाकर सरकार पर अनुग्रह कर रहा है तो उसे लगा कि मास्टर की तरह ये रेलगाड़ी भी उसके अनुग्रह से फायदे में है। टिकट लेकर उन्हें अतिरिक्त पैसे देना एक गंदी कमाई है। उसने टिकट न लेने की सोची। पीछे मूवी की टिकट मिल रही है! इतना सस्ता मजा, असल अनुग्रह ये है जो कोई मस्तानी जवानी उन जैसों पर कर रही है! एक नोट में मस्ती की तेरह घूंट!
ये चयन कईयों को सही लगा। रेलवे का टिकट काउंटर खाली हुआ, मूवी काउंटर पर भीड़ लगी।
रेलवे के अधिकारी सजग हुए, जांच गहन हुई, पर अब बेटिकट भीड़ इतनी बढ़ गई कि अधिकारी ही कम पड़ गए, भीड़ उनसे लड़ गई। इसके बाद सात दिन न ट्रेन चली, न मूवी। बंद रहा, हड़ताल रही, ट्रैक बंद कर बवाल हुआ, गुदाल मची।
अब रेल प्रशासन झुक गया, पर एक सीमा तक। ट्रेन के पिछले चार डब्बों को बेटिकट घोषित किया गया। थोड़े दिन मामला शांत रहा फिर सूचना फैली। आरक्षित टिकट वालों ने भी टिकट लेना बंद किया। चार डब्बों में ठेलम-ठेल तो पहले ही थी अब बाकी में खेल हुआ। जांच भी क्या की जाए! जो टिकट वाले डब्बे में बेटिकट पाए गए, उन्होंने कहा कि भीड़ के कारण या गलती से भटककर वो इधर आए हैं, कुछ ने कहा कि उधर शौचालय गंदे थे, इधर साफ हैं, कुछ ने कहा कि भीड़ में जूझ नहीं सकते, बीमार हैं!
फिर रेलवे ने चेकिंग करनी ही बंद कर दी! क्या बेकार का बवाल! नियम में ही छेद है! पूरी ट्रेन व्यवहार में फ्री है, टिकट लेने वाले नो मोर दैन वन टू या ज्यादा हुआ तो थ्री हैं।
‘ भाई! ट्रेन बड़ी लेट आ रही है! ‘
बात तो सही है! ट्रेन पहुंचे इससे पहले विद्यालय में छुट्टी हो जाती थी, दफ्तर निपट जाता था, पत्नी रसोई से निकलकर ऑन बिस्तर पाई जाती थी। हमने कहा, ‘देश तरक्की कर रहा है! ये तरक्की का दर्द है।’
अब ट्रेन हर दूसरे दिन रद्द हो रही है, इधर विद्यालय ठंडे पड़े हैं, उधर मूवी की गति भी मंद हो रही है।
‘पैदल ही जाए पड़तई का भैबा!’
‘एक जन, एक जनानी, एक घंटा में मूर्खधानी, भाड़ा पचास रुपए!’
हमने सोचा कि ये बाहर क्या शोर है? ओह! प्राईवेट गाड़ियों का हुजूम है। कितनी अच्छी बात! यही अर्थव्यवस्था को गति देंगे! मै भी बैठने को चला।
‘पैसा पहले निकालिये भाई! बाद का फेरा नहीं! ये मूर्खदेश है!’
ले लेना यार! कौन सा भाग जाऊंगा!
‘रेलगाड़ी के अनाड़ी नहीं है भाई! लिखकर दीजिए, अगर आप बटुआ न निकाले तो हम दुनाली निकालेंगे!’
मुझे नहीं जाना यार! अब अंदेशा है कि रेलगाड़ी तो बंद हो गई पर ये व्यवस्था कहीं मूर्खधानी ही बंद न करवा दे। जेब आईडेंटिटी है और आईडेंटिटी कम्युनिटी के लिए बड़ी खतरनाक होती है!
