मुझे लोग ईर्ष्या से, असुरक्षा से, दुर्भावना से छम्मक-छल्लो बोलते हैं, मैं इसलिए सहन करती हूँ कि कम से कम बाप के दिए नाम से तो मुक्ति मिली। ओपिनियन रखती हूँ तो लोगों की क्यों सुलगती है। बराबर का हक चाहिए, आजाद पंछी हूँ, खुली सरहद चाहिए। सही गलत का भेद पूर्वाग्रह है, बंधन है, हर पीली चीज उपयोग करती हूँ, हो सकता है, सोना या चंदन है। योग नहीं, ये है प्रयोग का काल, अपने पर आ गई हूँ, बिल फाडूंगी, अपने नेटवर्क पर चार्जेबल है मिस कॉल।