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केसरिया भारत: राष्ट्रीयता के पक्के रंगकेसरिया भारत: राष्ट्रीयता के पक्के रंग

जेन जी-डी-पी

मायबाप जी

‘का हो प्रजा! कैसन हाल है? ‘ अपदस्थ राजा, जिसे मालूम नहीं कि आज उसकी काठ की, गमछे वाली कुर्सी को उससे मोक्ष मिलने वाला है!, ‘कंचन-कामना सब के सुख है न!’ उसने खैनी लगाई।

इस दुनिया में बहुत से देश थे…हर देश का एक राजा था, एक प्रजा थी और कुछ कैदी थे, जिनका कोई न कोई अपराध पाया गया, राजा के प्रति या प्रजा के प्रति। आम तौर पर दोनों की राय एक ही थी, या एक ही बताई गई कि, कैदी को रोज सुबह शाम, बिना गिने तोड़ो!

इसके बाद, दुनिया में एक विशेष प्रजाति अस्तित्व में आई, जो न तो प्रजा थी, न राजा थी। इनका मानना था कि प्रजा को अगर बताये कि वो उसके राजा से बेहतर राजा है और खुद को उसकी प्रजा बताए तो…

फिर उसे लगा कि अगर वो राजा को सुझाये कि वो और भी अच्छा राजा हो सकता है बस, बस वो उसे प्रजा का मैनेजर नियुक्त कर दे। इससे उसे राज काज में सहयोग मिलेगा।

काम इतना आसान नहीं था, दो मोर्चों पर युद्ध था, एक तीर से दो शिकार भी तो करने थे! अगर आपको कच्चा माल, कारखाना, बाजार सब एक ही बार में चाहिए तो मेहनत तो लगेगी है। बने बनाये राज पाट को खत्म करना, वो भी बिना युद्ध के, बड़ा मुश्किल काम है।

थोड़ा पैसा-प्रचार, थोड़ा नैरेटिव, थोड़ा रेवड़ी-धन, पोस्टर, बैनर, सेल्समैन, बार्गेनर, दवा, वकील, शायरी, प्रदर्शन श्लील अश्लील! फाइनली प्रॉक्सी तैयार हुआ, राजा भी, प्रबंध भी, प्रजा भी और अनुबंध भी।

होना तो अंतिम में वही था, प्रजा को लगा कि वो राजा बनी। राजा को लगा कि उसका राज है, फिर एक दिन प्रबंधक ने अपने दफ्तर के आगे से प्रबंधक का नेमप्लेट हटाकर, अनुबंधक लिख लिया! उस दिन एक प्रजा बड़ी आगबबूला होकर राजा के केबिन में आई, उसका कहना था कि उसके राज में जी रहे प्रबंधक को इस नामुराद, आलम से पालम तक वाले राजा ने, मतलब रसोई से रजाई तक वाले राजा ने डराया, धमकाया और चेताया है कि प्रजा की नौकरी छोड़कर वो लंडन चला जाए! प्रबंधक बेचारा, चूहा मार दवाई खाने को तैयार है! प्रजा की फीलिंग हर्ट हुई है, इमोशन पर चोट लगी है।

यहाँ बात न्याय और अन्याय की है। अब फैसला होकर रहेगा! युद्ध घोषित।

पहला युद्ध – जंगल में पहला युद्ध लड़ा गया। एक शेर और एक हिरन के बीच। हिरन दौड़ी। उछली। दहाड़ नहीं सकी, पूछने पर बताया कि चूंकि वो हिंदुस्तानी संगीत का रियाज़ करती है, सो बिना मतलब गाँव फाड़कर चिल्लाना ठीक नहीं समझती। घास खाकर सो जाना तो ठीक है, क्योंकि वो प्योर बैगनहारी है। वो फूँक फूँककर खाना पसंद करती है, अहिंसा इज नॉट ए रिलीजन, इट इज ए वे ऑफ लाइफ! फिर, शारीरिक सुरक्षा के टेस्ट में सामना भेड़िया जी से हुआ। युद्ध हो, रगड़ा हो, झगड़ा हो, भेड़िए भाई के लिए अवसर तगड़ा हो! कचर जाओ, सिंग वाली को! भेड़िए ने सीधे मुख को आग़ोश में लिया, अभी खोपड़ी कड़काने ही वाले थे कि रेफरी की सीटी बजी! हरिन ने हांफते हुए अपना भेजा तौला! ‘नागिन लेगी इंतकाम! भेड़िए को हिस्स…हिस्स!…’ ये अंतिम लड़ाई थी, फिर हिरन पेंशन लेकर, शेर को जंगल की टेंशन देकर निकल ली।

दूसरा युद्ध – यह युद्ध खेत में लड़ा गया। एक बैल और एक गाय, दोनों के कंधे पर हल रखा गया! जो एक बीघा खेत पहले जोत दे, वो एक – दूसरे की सात पीढ़ी बिना परमिशन धोच दे। बैल की पुरानी आदत थी, उसने जाकर हल कंधे पर उठाया और गाया, ‘ तुरुक तुरुक धुन तुरुक तुरुक ता रा रा…’ बैल और हल दोनों जमीन पर तपस्यारत हो गए।

वहीं दूसरी तरफ गाय ने कहा कि हल थोड़ा बल्की है। थोड़ा फेमिनिन हल होता तो ठीक था। गाय को समझाया गया कि हेयरपिन से जमीन नहीं जोती जा सकती। फिर एक समझदार आदमी आगे आया और गाय के कानों में कुछ कहा। गाय ने लंबी निःस्वांस छोड़ी और कहा, ‘ओह! प्यारी जिंदगी!’ बाद में पता चला कि हल में सोने का फाल लगा है। एक बीघा तो कोई छोटी मोटी चीज नहीं! गाय बीच खेत में हल फेंककर बैठ गई, अबकी न सोने से मनाया जा सका और न राज-पाट होने से। अंत में प्रजा-जन स्वाभिमान की बात आई। गाय अचानक से खड़ी हुई, ‘मेरे मोटू-पतलु आयेंगे ठाकुर!’ इतना सुनने के बाद सबकी आँखों में आसूँ आ गए! पोंछने के बाद पता चला, सामने एक बैल है, एक हल है…एक और हल है और अनंत तक फैली जमीन है।

तीसरा युद्ध – ये हुआ हाथी और चींटी में। तय हुआ कि एक बड़े मुद्गर को उठाना है। तीन चांस मिलेंगे। चींटी शुरू करेगी। चींटी ने तौलकर देखा, ‘मुद्गर! मुझे नहीं उठाना! चूहे तू उठा!’

नियम भंग करना ठीक नहीं। चींटी ने  जिद की। चूहा भी तो प्रजा है! चूहा पिटने को तैयार बैठा है।

प्रयास एक, हाथी ने मुद्गर उठाया और चलाकर दिखाया। चूहा मुद्गर के नीचे जो गया, फिर अपने प्रयास से बाहर नहीं आया। अब चींटी ने अपना टैलेंट दिखाया और हाथी को जुकाम हो गई।

दूसरा प्रयास, हाथी मुद्गर उठाने तैयार है…अचानक से नाक में खुजली हुई और मुद्गर के साथ हाथी चार चित्त। …लेकिन चूहे के भी प्वाइंट जीरो ही रहे।

अगली बार के लिए हाथी ने नाक पर प्रोटेक्शन बांधा, बोले तो रुमाल। चूहा इस बार भी कंगाल। हाथी ने मचाया धमाल! लेकिन लोग-बाग इस बात से भी सहमत थे कि चींटी में भी एक विशेष टैलेंट है, चूहा और हाथी दोनों इस बात पर साइलेंट हैं।

अब मूर्खदेश में तहलका मच गया! अननेचुरल जस्टिस हो रहा है, इंसानों के शहर में जानवरों के चाल चलन का प्रैक्टिस हो रहा है!

मूर्खदेश में इसके बाद एक नया कॉन्सेप्ट आया! प्रबंधक लोग, अनुबंध छोड़कर, रूपांतरित राजा मतलब पूर्व की प्रजा में शामिल हो गए। अब हर छत के नीचे एक परमानेंट प्रजा का साथ देने कुछ टेम्परेरी प्रजा आने लगी…फिर टेंपररी प्रजा का खौफ इतना बढ़ गया कि…

‘का हो प्रजा! कैसन हाल है?’ अपदस्थ राजा, जिसे मालूम नहीं कि आज उसकी काठ की, गमछे वाली कुर्सी को उससे मोक्ष मिलने वाला है!, ‘कंचन-कामना सब के सुख है न!’ उसने खैनी लगाई।

प्रजा फुफकारी, ‘फू फू!’

‘काहे गरमाईल हैं! जाके तनी एसी के हवा खा ले आऊ जवानी घर घर के कहानी सीरियल चला ले!’

‘ अरे पापी राजा, तुम्हारा बजेगा बाजा! ‘, इतना कहकर प्रजा ने राजा को उठाया और जमीन पर पटक दिया।

दिग दिगंत में जयनाद हुआ, पुष्पवर्षा हुई, आह्लाद हुआ।

…इसके बाद प्रजा राजा हुई, प्रबंधक खुलकर अनुबंधक हुए, पदच्युत राजा स्वर्गवासी हुआ और मूर्खदेश का यश अविनाशी हुआ।

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