दीदी के प्रवास पर फिल्मी मीठा के विचार!
ये तपती हुई गर्मी… दिलरुबा के बदन पर नमकीन पसीने की बूंद…चारों तरफ पंखे के चलने की नशीली गूंज! रंगीन होठों पर एक हसरत! शरबत, शरबत और सिर्फ मदहोश कर देने वाला शरबत! … और तभी एक बदनसीबी घट जाती है, बिजली क्यों आँखों ही आँखों में कट जाती है! अलक से फ़लक तक गर्मी है, पसीना है! प्यार के नमक से तर-बतर एक इंजन सी हसीना है!
…और अचानक दिल जोर से धड़कता है, धीरे धीरे केशों को सुलझाता हुआ पंखा सरकता है…चारों तरफ एहसास है, पंखा है, हवा है, रोयें रोयें में तड़प है, ठंडक की प्यास है!
जवानी के खुमार में, हवा के आगोश में, ठंडे ठंडे प्यार में गोरी अभी मदहोश है…कातिल तक खोया है इस हुस्न में, कत्ल न होने का अफसोस है!
…तभी एक सिसकी! थमी-थमी साँस अचानक अटकी! गोरे खिले अंगों पर सिहरन है…जिस्म पर हर जगह बंधन है! मुहब्बत में घायल मन है, होठों पर वंदन है!
तभी पर्दा गिरता है!…
चुनरी से लंबी रसीद है…गोरी इतनी गरीब और बदनसीब है! उसकी जवानी को, जिंदगानी को, एक दर्द भरी कहानी को जुदा कर दिया गया! पंखे लगे रहे, माशूका को ही हवा कर दिया गया!
अब बर्फानी सफेद सर्द चादर में, छलकती उमर की गागर में, उजड़ी मुहब्बत के उथले सागर में तिल -तिल कर तड़पना तुम…जी भी चाहे तो भी न उन सफेद बर्फानी हमदर्दों से, उन तनहा खुदगर्जों से मत कहना अपने दिल का हाल…मत देना उनको अपना रेशमी रुमाल! बस इश्क के उस नशीले झोंके को याद करना…उस बेजान सफेद शहर को अपने होठों के रंग से आबाद करना! उस मंजर को याद करना…वो मधुर मादक पहला…पच्चीसवां…ठीक है! पचासवां! मिलन भूले से भी न भूले, ये फरियाद करना!























