बहुत महंगाई है साहब! गालियां और तालियां सब महंगी हो गई हैं। पहले गालियां सस्ती हुआ करती थी, पर अब गालियां खाने के लिए भी मेहनत करनी पड़ती है। एक साथ सौ-पचास लोग आपको गालियां दें, इसके लिए तो मेले – मीडिया में बारह घंटे एक्टिव रहना पड़ता है। पहले के जमाने में राह चलते किसी लड़की को एक बार आँख मार दिया करते थे तो पूरी सड़क पर आशिक का नंगा नृत्य हो जाता पर आजकल तो … भैंस को क्या मालूम कि उसकी पीठ में दो सप्ताह से रोज एक मच्छर आकर बैठा करता है!
मतलब आजकल पैसे के बाद समय और समय के बाद अगर किसी चीज का मूल्य बेहिसाब बढ़ा है तो वो है इंसान का ध्यान। वो एक अदृश्य मुद्रा बन गई है। अब इस ध्यान को पाने के लिए आप निम्न यत्न कर सकते हैं…
भैंस के आगे बीन बजाना
कैमरे के आगे नहाना
शमशान में गाना, गाना
पहाड़ पर से कूद जाना
अगर इतने पर सौ – दो सौ लोग रोज आके आपको छिह-छिह करके जाएं तो कल को कमोड क्लीनर वाले आपको अपने प्रोडक्ट के विज्ञापन के लिए साइन कर लेंगे। भले ही विज्ञापन में कमोड की उपमा आपके मुख से कर दी जाए पर कहते हैं कि
… परयो अपावन ठौर पर कंचन तजे न कोय।
तो अगली बार यदि कोई आपको गाली दे जाए तो आपको उससे अनुरोध करना है कि अगली बार वो फिर आए…बारम्बार आए…अपने सगे संबंधियों को लेकर आए…कैमरा लाउड स्पीकर लेकर आए…क्योंकि किसी की गाली खाने के लिए भी आपने काफी संतुलित रिस्क लिया होगा, नाप-तौलकर मेहनत की होगी। संतुलित और नाप-तौलकर जैसे शब्द उपयोग करने के पीछे यही कारण है कि ये गाली असल में उल्टी-प्रसिद्धि की एक सटीक माप है, चूल्हे में है तो खाना पकेगा, बाहर आई तो आग है। आप जिंदगी भर गालियां खाइए, कोई शारीरिक हानि नहीं होगी, चरित्र बलवान होगा, दृढ़ होगा, आप दुनियादारी सीखेंगे…कुछ विशेष क्षेत्रों में रोजगार हासिल करने के लिए आपको अहर्ता व उसमें भी वरीयता मिलेगी, बाकी कहीं सौ लोगों के हाथों से मुंह पर अगर औसतन एक-एक मुक्का भी लग गया तो…


















