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दीदी के प्रवास पर सख्त नारी के विचार!

सख्त नारी के विचार:

ओह गॉड! वाट इज दिस फैमिली नेमड फ्रॉड! एक मासूम सी बेटी को सिर्फ इसलिए एंटार्टिक भेज दिया गया कि वो कुछ फैन चलाती थी? आता होगा बिजली बिल! क्यों नहीं आएगा, आखिर ओजोन में गोल सा बड़ा होल भी तो इसी कंजूस दुनिया ने किया है! इतनी गर्म दोपहर, फिर लू का ब्लू, सामने ऐसा गंदा सा व्यू, कोई पंखा न चलाये! हम तो पंद्रह बीस चलाते, वैराइटी वैराइटी के खरीद लाते और तो और पीठ पर टांग लेते, कमर पर बांध लेते! दीदी! आप आत्मनिर्भर क्यों नहीं हुई! क्यों प्यार, परिवार नाम पर गई छली? इसी परिवार ने तुम्हें जख्म पर जख्म दिए, टीन वाली छत दी, दोपहर में गरम चाय पिलाई, पांच मीटर की साड़ी पहनाई! तू आज़ाद हो जाती! आबाद हो जाती! अपने पैरों पर खड़ी हो जाती तो पूरी खूनखोर कायनात बर्बाद हो जाती। पोलर बियर तुम्हें परेशान नहीं करेंगे! जीव जंतु तुम्हें बदनाम नहीं करेंगे! बर्फ की उजली चादर मिलेगी, नीली आकाशिनी मिलेगी, सूर्यिनी का सीधा प्रकाश मिलेगा, अपनी ग्रोथ पर ध्यान दे सकेंगी इतना अवकाश मिलेगा। … अब मुझे भी जीने का दिल नहीं कर रहा! जीवन निस्सार लगता है! इस टूटे हुए दिल से जीना बेकार लगता है! दीदी! तुम क्यों चली गई! मैं भी आ रही हूँ…चालीस पचास साल होते होते पहुँच जाऊँगी! इंतजार करना अपनी दुखियारी बहन का!

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