लिखा है केला क्रिया, केला विलास! आपने वो वाला शास्त्र ज्यादा पढ़ लिया है इसलिए केला को केलि समझ बैठे! वैसे गलत भी नहीं, केलि भी सही ही बैठेगा!
ऊपर वाला बड़ा कलाकार है! उसने दुनिया गोल बनाई। गोल एक ज्यामितीय आकृति है जिसमें पहले और आखिरी बिंदु के साथ, ‘सब मिले हुए हैं जी!’, वाली बात हो जाती है। मिसाल के तौर पर आप ऊपर का चित्र देखिए, हर कोई, हर किसी पर केला/केलि तानकर खड़ा है। हर कोई भयभीत है…सर्वत्र केले का पीलापन, केलाधारियों के चेहरे पर छाया हुआ है। भले सबने सब पर केले ताने हैं पर सब के फटे पैजामे हैं। कोई केला चलाए न चलाए, ये डर कि कहीं केला चल न जाए, मुखर है। भगवान ही जाने, किसका केला पहले चलेगा! अगर कोई एक केले का प्रयोग करेगा तो अगले वाला भी करेगा…जैसे कि हम जानते हैं कि दुनिया गोल है, पहल करने वाले पर अंत में ही सही पर, घूमकर, केला चलेगा ही चलेगा। खैर, ये तो एप्लिकेशन है।
भगवान ने न सिर्फ दुनिया गोल बनाई है, दुनिया वाले भी चाहते तो सीधा या तिरछा चल सकते थे पर वो भी माया के अधीन होकर गोल ही चलते हैं। गोल, वो भी चेन में। उदाहरणार्थ खाद्य श्रृंखला। हम पर तुम, तुम पर रखवाला, मेरा जीजा, उसका साला! हर खादुर पर कोई बहादुर बैठा है। परजीवियों पर भी परजीवी सवार हैं, पेट की लीला अपरंपार है। तो अब आप समझ चुके होंगे कि असल में केला और केलि विलास से ही जग का समृद्ध इतिहास है। जहाँ होगा केला, वहाँ खिंचेगा ही गोला, केला और गोला साथ मिलेंगे तो होगा ही खेला! फिर सबको लगा ही रहेगा झमेला!
केला, खेला का नियम है, गोला का संतुलन है और जब किसी की पीठ पर तनता है तो आध्यात्मिक केलि विलास का नियम है, प्रेम है, सौहार्द्र है, संयम है, पेट है, पकौड़े हैं, हांडी मटन है! इसलिए जब केला ही आधार हो, केला ही हथियार हो, केले से ही भय हो, केले से ही प्यार हो तो बस…कीजिए तय, हो जाना है प्रेम-मय! मजे लीजिए, मजे देने जो रहते हैं, तभी तो हम हैप्पीनेस के मुआमले में शीर्ष पर रहते हैं!






















