मैं सेवक हूँ, जन्म से ही...एक बार की बात है, सेवा करते हुए एक युगल के घर, असंख्य और सेवाओं को करने के लिए साक्षात् सेवा के आने का योग बना...सबने जन्म लेते ही कहा, सेवा हुआ है! कोई सेब का 'से' भी बोले तो वो सेवक प्रकट हो जाता है। दुनिया और दुनियादारी सब छोड़कर सेवा की...सेवा करते हुए कभी अगर 'व' के बाद वाली मात्रा बची, तो उसी से संतोष कर लिया। आज तक इतनी सेवा की है, तभी पृथ्वी सूर्य के चक्कर, कम से कम पांच हजार साल बाद भी लगा पा रही है। सेवा ही धर्म है, सेवा ही कर्म है, सेवा में ही अस्तित्व का मर्म है।