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केसरिया भारत: राष्ट्रीयता के पक्के रंगकेसरिया भारत: राष्ट्रीयता के पक्के रंग

नेताजी

मैं सेवक हूँ, जन्म से ही...एक बार की बात है, सेवा करते हुए एक युगल के घर, असंख्य और सेवाओं को करने के लिए साक्षात् सेवा के आने का योग बना...सबने जन्म लेते ही कहा, सेवा हुआ है! कोई सेब का 'से' भी बोले तो वो सेवक प्रकट हो जाता है। दुनिया और दुनियादारी सब छोड़कर सेवा की...सेवा करते हुए कभी अगर 'व' के बाद वाली मात्रा बची, तो उसी से संतोष कर लिया। आज तक इतनी सेवा की है, तभी पृथ्वी सूर्य के चक्कर, कम से कम पांच हजार साल बाद भी लगा पा रही है। सेवा ही धर्म है, सेवा ही कर्म है, सेवा में ही अस्तित्व का मर्म है।

मूर्ख-पत्रिका

इसके बाद नेतास्थान में हाहाकार मच गया। संदेश प्रचारित हो गया कि भयंकर दमन हो रहा है, भोली-भाली जनता को संख्या गणित में हराकर...

चर्चा में

टोपी तो आसान आजमाना है, नीचे अरसों से मैल खाता ये पुराना खानदानी पायजामा है! अब देखते हैं, आगे कौन सा नया दौर आना...

चर्चा में

लोग पूछते हैं कि ‘आखिर कब तक?’ कब तक लोग भूखे मरेंगे? कब तक अपराध होता रहेगा? कब तक भ्रष्टाचार का नाच होता रहेगा?...

प्रस्तुति एवं COPYRIGHT © 2022 MRITYUNJAY MISHRA