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केसरिया भारत: राष्ट्रीयता के पक्के रंगकेसरिया भारत: राष्ट्रीयता के पक्के रंग

चर्चा में

कब तक

लोग पूछते हैं कि ‘आखिर कब तक?’

कब तक लोग भूखे मरेंगे?

कब तक अपराध होता रहेगा?

कब तक भ्रष्टाचार का नाच होता रहेगा?

कब तक विभाजनकारी ताक़तें हावी रहेंगी?

कब तक अनैतिकता प्रभावी रहेंगी?

कब तक आतंक का साया रहेगा?

कब तक बरबादी चलेगी?

इन सारे सवालों के जवाब देने के पहले मैं पुछने वाले को पहले बिठाता हूँ! उसे चाय-पानी पूछता हूँ! बाल-बच्चों के हाल-चाल लेता हूँ और फिर ये कहता हूँ कि वो मुझे और कोसे! मेरी बुराई हर उस गली में जाकर करे, जहां मैं अपनी कीर्ति नहीं पहुंचा पाया! मुझे ये पानी पी-पीकर कोसने वाले लोग, दुधारू गाय से लगते हैं! ये इतना पौष्टिक आहार देते हैं जितना माँ बच्चों को स्तनपान कराके नहीं दे पाती!

अब जब पूछा ही गया है! तो मैं बता दूँ कि बहुत लंबी ट्रेन है मेरी ये जनता-जनार्दन की पोलिंग बूथ की लाईन! जैसे आखिरी डब्बे को ये पता नहीं होता कि इंजन फलां खंभा, फलां पुल, फलां प्लेटफॉर्म पार कर गया है, तब तक बताना मुश्किल है कि बाहर का नजारा कैसा खूबसूरत है! भारत की आबादी, भारत का फैलाव, भारत की प्राथमिकता, भारत की सोच इतनी भिन्न-भिन्न है कि उन्हें किसी एक मुद्दे पर एक साथ सोचने के लिए मजबूर करना भी आसान नहीं है! जब तक कोई बड़ी हानी न हो! कोई बड़ा बलवा न हो, तब तक लोग रोजी-रोटी के लिए, मौज-मस्ती के लिए निकलेंगे ही, अगर शक पैदा हुआ तो ज्यादा से ज्यादा एक बार खिड़की खोलकर (मीडिया) एक बार बाहर देख लेंगे और फिर….

जिस तरह एक हाथी उठने के क्रम में घास-पात की दुर्गति करता है, ठीक उसी तरह सिस्टम को हिलाने के लिए भी सौ-सवा सौ खून की बोतलें लग जाती हैं! अगर घटना के बड़े बने हुए बिना कदम उठा लिए गए तो नतीजा ये होगा कि लोग खुद कहेंगे कि सरकार बेकार के काम कर रही है! कई बार तो ये तक सुनने को मिल जाता है कि सरकार उल्टे काम बिगाड़ रही है! अब आप उखाड़ लीजिये क्या उखाड़ना है! प्रयास यही किया जाता है कि ऐसा दिखाया जाये कि बात हुई, बात बड़ी होती गयी, बड़ी होती-होती बात हाथ से निकल जाने को है! ऐसे समय एक बड़ा ही नाजुक मौका होता है चौंका मारने का! काम होते ही हमारे पुराने अकर्मण्यता के गप्प तो खत्म होते ही हैं और साथ में धोनी-युवराज का धमाकेदार फिनिश करने वाली मिसाल भी दी जाती है!

हमारे पूर्वजों ने भले ही फुटबाल के खेल में क्रिकेट के नियमों के तहत खेला हो पर हम फुटबाल के खेल को कुछ इस कदर नियम से खेलेते हैं कि फुटबाल भी शरमा जाए! जीत जरूरी है, बाँकी तो संत-महात्मा होना भी मजबूरी है!

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