हम मछली पकड़ते हैं, तालाब में, नदियों में, समुद्र में, या ऑनलाईन इधर-उधर! साधारणतः मछली मारना आजीविका है कि हम इससे कुछ न कुछ पा लेते हैं। पर यदि आपकी मंशा जलस्रोत को साफ करने की है और आपका मानना है कि एक-एक मछली चुनकर आप कुछ बरसों में जलाशय साफ कर देंगे तो ये अव्यावहारिक है।
हर छोटी मछली को, किसी न किसी बड़ी मछली का संरक्षण होता है, फिर उससे बड़ी मछली को उससे बड़ी…बड़ी-बड़ी मछलियों का बड़े-बड़े जल दैत्यों से नियमित या यदा कदा संपर्क होता है। कई बार मछलियां अपनी सीमा से बाहर जाकर, या कुछ व्यक्तिगत भूल करके, जिसमें उन्होंने किसी बड़ी मछली को संज्ञान में नहीं दिया हो, उनका निर्देशन न लिया हो या उनको विश्वास में न लिया हो, तो वो आपके जाल में अवश्य फंस जाएंगी अन्यथा अगर भूलकर भी किसी बड़ी मछली की पूँछ आपके जाल में उलझी तो फिर…एक दिन की रोटी- दाल के लिए जिंदगी मुश्किल! पर जिनकी जिंदगी इससे चल रही है, वो भी सही है, यहाँ कुछ गलत भी नहीं है बस जाल और माल संतुलित हो। आप को शुभ यात्रा, मछलियों से हो जलाशय आबाद होते हैं।
जिनको लगता है कि जलीय जीवों के लिए अच्छा परिस्थितंत्र बनाने के लिए जल का शोधन करना है, उन्हें जाल लेकर धारा में उतरना बेवकूफी ही नहीं, फिजूल, खतरनाक और विवादित भी है।
कोई भी व्यक्ति, अकेले व्यवस्था नहीं है, अधिक समय के लिए तो बिल्कुल नहीं, बड़े परिपेक्ष्य में तो और नहीं। एक व्यक्ति निष्प्रभावी है, कुछ बदलने के लिए, कुछ करने के लिए। वो बकरा तो बन सकता है पर मटन चावल के होटल बंद नहीं करवा सकता…रियल लाइफ में।
जो बड़े दिखते हैं, उनके इगो बड़े हैं। जो खड़े दिखते हैं, उनके मंच ऊंचे हैं। जो सुनने में आ रहे हैं, उनके एंप्लीफायर ठोस हैं। एक व्यक्ति, एक संस्थान से है, एक संस्थान, एक विधान से है, एक विधान, कुछ प्रावधान से है, और हरेक प्रावधान, आपके, अवधान, व्यावधान और समाधान से है और ये सब के सब संबंधित हैं, आपके सामुदायिक सुख और सम्मान से। जो आपका है, आप उसके हैं और चूंकि आप एक-दूसरे से हैं सो आप एक दूसरे को पकड़े रखिए।
लोग आयेंगे, जाएंगे, सरकारें बनेंगी, गिरेंगी, कानून बनेंगे, बदलेंगे, मिटेंगे, ये देश/आप समृद्ध रहने चाहिए, इस देश का लोकतंत्र/आपकी इच्छा अमर रहनी चाहिए…बांकी सब कुर्सी और व्यवस्था के कॉन्ट्रैक्ट हैं, बाकी ऊपर से नीचे आने वाले बड़े बदलाव, खुद कास्केडिंग इफेक्ट हैं।

















