हम खानदानी आदमी हैं भाइयों/बहनों! हमारे खानदान की परंपरा से हमें मिला है, एक घुटने भर का पायजामा। इस पायजामे को हमारी मरी हुई महादादी ने अपने हाथों से सिला था। हमारे खानदान की परंपरा के हिसाब से इस पैजामे को हर नई वधु ने सास बनते ही नीचे से एक इंच छोटा कर दिया। हमारी माँ ने भी इस परंपरा को कायम रखा।
विभिन्न अवसरों पर ये पायजामा पहनना हमारी पहचान है, हमारे खानदान के आयोजनों में इसके बिना नो एंट्री है। निर्वस्त्र आदमी को इंट्री मिल भी जाए पर बिना इस पायजामे के, कुछ और सूत के नाम पर लपेटकर संत-महंत तक अंदर पर नहीं मार सकते।
बहरहाल, हम तो भोज-लोलुप आदमी हैं, खाने के कुछ भी पहन सकते हैं, खास कर कि तब जबकि अपना खानदानी माहौल है, पहचान के लोग हैं, अच्छा खाना है, कुछ विशेष यत्न नहीं कर करना, कहीं दूर नहीं जाना है…पर हमारी रामप्यारी!…हमारी दहेज दुलारी! हमारी लालटेन, हमारी इंजोर, हमारी प्राणप्रिया, धर्म-पत्नी, जीवन-संगिनी, चितचोर, हमरी जोर! कहती है कि एन वक्त पर मेरे पायजामा का नाड़ा कस जाता है और उनका प्लान तहस होने के साथ, नहस भी जाता है! उनको पायजामे से थोड़ी सैद्धांतिक या व्यावहारिक नहीं, बल्कि स्त्रियोचित शर्म, हिचक और आपसी पहचान की दूरी है।
उन्होंने कहा कि अब पायजामा छोड़ दूँ, फैशन मोड़ दूँ, लीक तोड़ दूँ…हमने कहा कि आदत तो छोड़ूं पर क्या परिवार फोड़ दूँ? उन्होंने समझाया कि खानदान की पहचान पायजामे में नहीं, पा जाने में है। जो पायजामे की बात कहे आप उसको प्यार की झप्पी दे दो, न माने तो डीएनए की पप्पी दे दो, उससे भी न हो तो उसके बच्चों को मिठाई के पैसे दे दो, दुल्हन की जगह तो खाली नहीं पर किसी की जोरू को बहन बना लो…भांजे-भांजियों से निभा लो।
ये कहकर जोरू जी ने एक रंगीन सूट-बूट दिया है। कहा कि अभी के लिए सिर्फ टोपी बदलकर देखो, अच्छा रिस्पांस मिले तो फिर देखेंगे! जल्दी ही पैजामे से सूट-बूट में आ जाओगे! कब तक ये लीक निभाओगे!
टोपी तो आसान आजमाना है, नीचे अरसों से मैल खाता ये पुराना खानदानी पायजामा है! अब देखते हैं, आगे कौन सा नया दौर आना है!

















