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केसरिया भारत: राष्ट्रीयता के पक्के रंगकेसरिया भारत: राष्ट्रीयता के पक्के रंग

जेन जी-डी-पी

गज़ब का गियान

बाबू जी बोले, संसार में दस अरब लोग हैं, सब के सीने पर उंगली सटाकर बोलना कि ये चोर…ये चोर…पूरी जिंदगी छोटी न पड़े, एक ही ज्ञान हासिल करने में बुद्धि खोटी न पड़े, इसलिए लिख लो…

रंजन इस संसार में लम्बे हो गए अब सब लोग।

कुछ तो चादर-ओढ़, कुछ तो बहुते चादर-ओढ़।।

मास्टर साहब कहिन, जाओ दुनिया देखो, ज्ञान प्राप्त करो। हम फिर आज्ञा लेकर चल पड़े।

हमने देखा कि दुनिया में हरी हरी घास है। ऊपर आकाश है, सूर्य है, नीचे धरती है, प्रकाश है।

इस दुनिया में सब सुंदर है…प्यारा है…न्यारा है!

फिर हमने देखा, एक बकरी आई और हरी घास चर गई।

अब हमें लगा कि दुनिया में ज्यादातर सब कुछ सुंदर है…प्यारा है…न्यारा है!

फिर हमने देखा, एक शेर आया और बकरी को घास समझकर चबा गया।

अब हमें लगा कि दुनिया में ज्यादातर सब कुछ छछूंदर है…मारा है…आवारा है!

फिर हमने देखा कि शेर मर गया और गिद्ध पार्टी करने लगे।

अब हमें लगा कि ससुरी पूरा दुनिया ही भगन्दर है, ठेलिन है, गैसोलिन है।

फिर बारी आई मुहब्बत की। हमारा दिल और बटख़रा बड़ा हो गया था।

हमने देखा तो पाया कि दुनिया में सर्वत्र मुहब्बत ही मुहब्बत है। प्यार है, सँवार है, धक धक है, इश्क़ धुंआधार है।

फिर हमने देखा कि हमारी कट गई।

अब हमें लगा कि दुनिया में कुछ ब्लैक होल है, ज्यादातर तो कम से कम शॉपिंग मॉल हैं।

फिर हमने पाया कि सामने हाई एंपियर का सॉकेट है और फटी जेब में हाथ डालने पर एक यूरेनस और नेप्चून के अलावा एक टूटा हुआ रॉकेट है।

रॉकेट अचानक से उड़ा और मोमो के ठेले पर जा गिरा। अब हमें कब्ज है, बाधित नब्ज़ है और मौन लब्ज़ है।

अब हमें लगा कि ससुरी पूरी दुनिया ही कचनार है। सर्वत्र छिले अनार हैं। क्या अनाचार है! साले, सब लोढ़ियों का सिलोठ ही भतार है।

अब हम बड़े हुए, बुजुर्ग हुए, चूजे थे, अब मुर्ग हुए, झोपड़े से दुर्ग हुए, दिल के तागे गुलाबी से सुर्ख हुए।

पहले दिन लगा कि दुनिया में सब भले लोग हैं। सब अच्छे हैं, सच्चे हैं, सबके एक बाप और अपने नाम से जाने जाने वाले बच्चे हैं।

फिर हमें दूसरे दिन पता चला कि कुछ लोग जेल में हैं, बांकी अपने जैसे हैं, अपनी अपनी तरफ से खेल में हैं।

फिर अगले दिन हमें पता चला कि कुछ जेल में हैं, कुछ बेल में हैं। साला, क्लियर नहीं, कौन – किस खेल में हैं?

अब अंतिम दिन हमें ज्ञान हुआ है कि पूरी दुनिया झोपड़ी वालों की है।

जब ज्ञान खत्म करके घर लौटा तो बाबू जी कहे, क्या पढ़े?

हमने कहा, यही कि दुनिया गोल नहीं, गंडगोल है।

बाबू जी बोले, संसार में दस अरब लोग हैं, सब के सीने पर उंगली सटाकर बोलना कि ये चोर…ये चोर…पूरी जिंदगी छोटी न पड़े, एक ही ज्ञान हासिल करने में बुद्धि खोटी न पड़े, इसलिए लिख लो…

रंजन इस संसार में लम्बे हो गए अब सब लोग।

कुछ तो चादर-ओढ़, कुछ तो बहुते चादर-ओढ़।।

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