पुराना जमाना था जब लोग कुछ डिफिकल्ट होते तो कहते कि मूत्र विसर्जित करूंगा तो धुआँ धुआँ हो जाएगा। जिस चीज में जिस चीज की अधिकता हो, उसी का गुण उसमें सर चढ़कर बोलता है। मूत्र से कुछ भी उठे पर धुआँ उठ जाए, ये बात विशेष फील होती है। लोग तो ऐसे आदमी को स्पेशल समझेंगे ही। अतः धुआँ देने वाले इन लोगों का समाज में बड़ा रुआब था।
अब अगर कोई कहे कि हग दूँगा तो समझ आयेगा कि गंदा महकेगा, कोई कहे कि हग रहा हूँ, हींग प्रॉसेस कर लेना तो तारीफ की बात है।
अब किसी ने कहा कि थूक दूँगा तो परिणामत: मुँह टूट जाएगा। कोई बोलेगा कि घुसेडूंगा तो उखड़ जाएगा।
कोई बोलेगा कि फटूंगा तो टंग जाएगा।
इस तरह हम पाते हैं कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है।
मानुष मानुषी को देखें तो…
गर्दभ गर्दभी को देखें तो…
शूकर शूकरी को देखें तो…
कुकुर कुकरी को देखें तो…
विशेष परिस्थितियों में मानुष, गैर मानुष को देखें तब भी कई बार कुछ-कुछ हो जाता है।
अतः देखना एक शारीरिक योग्यता है, दिख जाना सो अपि। अगर आपको लगता है कि आपके देखने की क्रिया में कुछ विशेष है तो आँख नहीं, बुद्धि में कम निवेश है।
बात रही अभिव्यक्ति की तो सबसे प्रचंड अभिव्यक्ति है, खाना ढेला, करना गीला और चखने को न मिले स्ट्रॉबेरी और वैनिला तो चख लेना कुछ भी पीला!
बाकी तो सब मचान हैं, कभी कोई जीव चढ़ बैठा, कभी दो पैरों वाला इंसान है!















