बड़ा मातम पसरा हुआ है। भैया ने गंजी फाड़ रुदन जारी रखा। बुक्का फाड़कर रो रहे हैं! शोर से मुर्दा भी उठ भागे! सामने बंदूकवाली भौजी की फोटो है, माला टांग दी गई, धूप और अगरबत्ती दनादन फूंकी जा रही है। हर तरफ हवा में धुएँ का धू-धू और मार खाए पिल्ले सा भैया का कू-कू तैर रहा है। फिर अचानक से चीत्कार, ‘ हाय बाप! माय बाप! हाय बाप! बाप बाप!’
बन्दूकवाली कितना मारती थी इसे! लोग बाग बात कर रहे हैं। रोज सुबह इसके गाँव पर गोलीबारी होती थी! गालियों से इसका मुँह धुलाती थी, उल्टा लटकाकर इसका शोषण करती थी, जब तक इसके एड़ी से पसीना न निकले, भोजन नहीं करती थी। हर हफ्ते में एक बार पट्टी न लगी तो क्या हुआ! कागज ठूंसकर होल छोटा करना पड़ता था, इतना डंडा इस बेचारे को करती थी बंदूकवाली। हद तो तब हुई जब एक दिन भैंस ठीक से न धोने की सजा इन्हें गोबर खाकर चुकानी पड़ी। एक चाचा ने बड़े अफसोस से कहा कि फिर भी ये बड़ा प्यार करता था उससे! अब बेचारा बेसहारा हो गया। ये तो बंदूक उठाने में हग देगा फिर बंदूक की आन बान शान और बंदूक से गोली की उड़ान तो भूल ही जाइए! बंदूक वाली शेर बकरी मार लाती थी तो रसोई चलती थी, अब ये बेचारा अबला आदमी…क्या बेचकर खाए! शरीर पर मांस नहीं, किसका सौदा करे?
वहीं मोमकेश मक्षी जी खड़े थे! उनको लगा कि दाल में नकली घी है! भैया ही बताएंगे कि क्या सही है! भैया जी ने कहा कि आम दिन की तरह बंदूक वाली भौजी शिकार पर गई थी, अभी तक दो शेर मार गिराए थे। गर्मी बहुत थी, सो भैया से अमझोरा मांगा। भैया ने दिया और गटगटा गईं। अरे! अमझोरा में केसर! भैया ने कहा कि वो महीने भर से केसर नहीं लाए हैं..कहीं! और बन्दूकवाली ‘हाय मैं मर गई!’ मोमकेश जी ने चाय की गर्मी महसूस की! अचानक उनके हाथ से कप छूटा और गरम चाय भैया के सीने से सरकती हुई नीचे उतर गई। भैया छटपटा उठे, ‘ ईईई…’
मोमकेश जी के चेहरे पर मुस्कान थी। अध्याय अधूरा था।
फिर उसी गाँव में एक और घटना हुई। अब की बार बेलन वाली भौजी के साथ घटना हुई। बेलनवाली भौजी बड़ी पतिव्रता, सती – सावित्री महिला थी। दिन रात भैया की सेवा करती थीं। भैया रूठ जाते और खाने को मुँह नहीं खोलते तो भौजी, दसवें द्वार से निवाला डाल देतीं। भैया प्रेमालाप नहीं करते तो भैया को मुगलिबाण चढ़ाकर प्यार रसीद देती। भैया सुबह देर से उठते तो वो कान के पास ले जाकर एक दो दर्जन चूड़ियाँ फोड़ देती। रोज भैया पर एक टिकिया साबुन और ग्यारह पाउच सम्पूल खर्च करती। भैया की हजामत अपने सामने करवातीं। नहवाकर, ऊपर से नीचे पाउडर लगातीं, चड्डी बनियान पहनाकर बाल थकर देती। अब बेलनवाली गुजर गई और भैया मातम के समय मौन हैं।
बेचारे को ऐसी मार पड़ी है कि रो नहीं पा रहा! लोग समझते हैं कि दुख ज्यादा हो तो इंसान मौन हो जाता है। दिल रोता है तो आंसू नहीं गिरते, कलेजा दुखता है तो गला और गाँव नहीं फटते। बेचारा भीतर ही भीतर घुटकर मर जाएगा! ये थोड़े ही किसी को दुख कहने जाएगा! ये दुख के साथ, दुख की घड़ी के साथ, खुद भी बीत जाएगा! करेगा क्या बेचारा, ये बेलनवाली के बाद सब की हिम्मत है, सबके लिए ऊपर वाले की रहमत है। ये अगर आंसू में टूट गया तो घर टूट जाएगा, भविष्य टूट जाएगा और तो और बेलनवाली के प्यार की निशानी, किचन में बसने वाले शक्तिकरण की कहानी, वो बेलन भी टूट जाएगा! इसे खड़ा रहना होगा…इसे जीना होगा…इसे जहर पीना होगा!
मोमकेश बक्षी जी से नहीं रहा गया। इस बार उन्होंने बेलनवाली की फोटो के सामने रखा बेलन उठाया और बड़ी ही लापरवाही से हवा में हिलाया…पकड़ कमजोर हुई। बेलन सर पर गिरा और भैया बाप हो बाप चिल्लाते हुए दौड़ पड़ा!
इसके बाद मोमकेश जी ने अपना चश्मा पोंछा, उन्हें याद आई वो लाइन, ‘जाके पैर न फटे बीवाई, सो क्या जाने पीर पराई! होएगी पीर तो करोगे ही माई माई! जिसको जैसे आए रुलाई!’



















