फ़क़ीर इंटरनेशन्ल बड़ी कंपनी थी। यहाँ बड़ा काम-काज वाला माहौल था। लोग दफ्तर तो दफ्तर, घर पर भी काम करते थे। लोग कमोट पर बैठे बैठे मार्केटिंग और घोड़े पर बैठे बैठे सेलिंग किया करते थे। इतना ही काम होता था कि आमदनी बढ़ती गई। लेकिन बाज़ार की भी एक सीमा होती है। यहाँ वैसे तो सुई से लेकर तलवार, जीन्स से लेकर सलवार सब कुछ बनता था, लेकिन एक बात है, फोकस! वो शिफ्ट होता रहता।
जब पैसा बहुत हो गया, तब फ़क़ीर कंपनी ने फ़ोकस शिफ्ट किया। प्रोडक्ट तो हर कोई बनाता है, अपन लांग टर्म टिकने के लिए, कंज्यूमर ही क्यों न प्रोड्यूस करने लगें? फिर उन्होंने सस्ती दरों पर खूब बहाली निकाली। नए मैनेजर आधे आधे घंटे की शिफ्ट करते और कंपनी से मिलने वाला प्रोटीन युक्त लंच कर के कंपनी की गाड़ी से घर चले जाते। फिर भाग्य के इस भंडारे में लाइन लंबी लगने लगी, दूर दराज से मैनेजर बनने के इच्छुक लोग पहुँचने लगे। फिर एक अनोखी बात हुई, एक दिन एक Y मानव, प्रशांत महासागर की अग्नि मेखला से कंपनी के दफ्तर पहुँचा, एक J मानव मारियाना खाई से आया, एक K मानव तलातल से और X मानव नेपच्यून ग्रह से पहुँचा। सब को बहाली मिली और फिर एक परिपाटी स्थापित हुई, रायता रिक्रूटमेंट की।
कंपनी के एक बड़े प्रबंधक दांत पीसते हुए, डायरेक्टर के पास पहुँचे और डायरेक्टर ने उन्हें दिल्ली का फ़ेमस मोमो खिलाया। वो बोले कि ये मूर्खिस्तान है, यहाँ सिर्फ़ कल कारख़ाने से ज़िन्दगी और कंपनी नहीं चलती! यहाँ हमें उससे बेहतर कारोबार मिल सकते हैं। प्रबंधक जी ने अपनी दिक्कत कही, काम कैसे होगा?
डायरेक्टर साहब बोले, सब काम है, जो काम नहीं है, वो भी काम है, यत्र-तत्र-सर्वत्र जो हो रहा है, सब काम है। मनुष्य एक कियाशील प्राणी है, वो हमेशा कोई न कोई मानसिक या शारीरिक काम करता है, इन कामों से अपना काम बनता है तो बस, इससे बेहतर और क्या मसला जमता है!
प्रबंधक जी ने कहा, तो अगला क्या फोकस है? डायरेक्टर साहब बोले कि देखिए! प्रबंधक जी सर खुजलाते हुए बाहर आए। ये सौ की संख्या में भर्ती मैनेजर मुफ्त का लंच भकोसकर अब आधे घंटे की ड्यूटी करके घर जाएँगे। प्रबंधक साहब को लगा कि चप्पल निकालकर इन्हें मारें!
इसी भाँति एक दिन Y मानव उनके पास आकर बोला कि उसे महीने में पाँच दिन मुँह धोने की छुट्टी चाहिए। ग़ज़ब है! फिर उसने कहा कि वो हवा बदलने के लिए कभी भी साल भर की छुट्टी ले सकता है! इतने से भी उसका पेट न भरा तो उसने कहा कि वो पंद्रह मिनट की शिफ्ट करेगा और बाँकी पंद्रह मिनट वो दफ्तर के जिमखाने में कसरत करेगा। “तुम्हारा काम कौन करेगा?”
इतना सुनते ही Y मानव ने रोना शुरू कर दिया और तभी वहाँ K मानव प्रविष्ट हुआ, उसने प्रबंधक को कहा कि अब वो Y मानव की क्षति पूरी कर देगा। प्रबंधक जी की बत्ती जली! … Y मानव को बैठने तो देंगे नहीं, कुछ काम तो करेगा ही, उससे ज़्यादा ये K का कटेगा।… प्रशांत महासागर से उसके बाद अपार लोग भर्ती हुए…अब तलातल से भी लोग इस लोभ में ज़्यादा आने लगे कि Y मानव के देशवासियों की मदद करनी है। इसी परोपकार में कंपनी का उपकार होने लगा। प्रबंधक साहब ने तरकीब लगायी, Y मानव को बोला कि रात में दो बजे, कंपनी की नई गाड़ी का टेस्ट ड्राइव करो, डेढ़ सौ किलोमीटर रीडिंग नहीं हुई तो साल भर मुँह धोने की छुट्टी नहीं मिलेगी। Y मानव के लिए अब जान की बाज़ी लगने लगी और इस बार नेपच्यून का X मानव अनुग्रहित हुआ। गाड़ी पहाड़ी से गिरी और X मानव टूटी हड्डियों के साथ पुनः नेपच्यून चले गए। अब इधर प्रबंधक साहब का दिमाग़ ठनका! कमाए धोती वाला और खाये टोपी वाला!
प्रबंधक जी को लगा कि यहाँ जान की बाज़ी लग रही है और अपन रेफ़री! हमारी गाय, गाय का दूध और पनीर ले जाये, मोनू मूद! उन्होंने Y मानव को बुलाया, या तो हमाये से कर लो दोस्ती, या तो जाकर लड़ो वृषभ से कुश्ती! Y मानव सेट हो गए।
K मानव ने तलातल संपर्क किया।
प्रबंधक को डायरेक्टर का फ़ोन आया। उन्होंने कहा, तरुवर फल नाही खात है, कुर्सी सेवार्थ है, ना कि स्वार्थ है! तुमने K जैसे फ्री में काम करने वाले को नाराज किया। अब न तो Y और कि न तो K से कुछ फ़ायदा है! अपने लालच में…प्रबंधक ने कहा, “७२ घंटे काम!” डायरेक्टर बोले, “ काम सिर्फ़ ७२ मिनट ७२ सेकेंड! बाँकी ७२ घंटे मौज मस्ती ग्रैंड! अर्थव्यवस्था, काम नहीं, कामनाओं से चलती है। मस्ती की पाठशाला के बाद अब आराम की कार्यशाला! इतिहास में पहली बार एक छोटे मैनेजर K मानव ने बड़े प्रबंधक को चलता किया था। अब रसातल से एक नया प्रबंधक आया, उसका नाम था KT मानव!
इसके बाद कंपनी ने रियल स्टेट तोड़ा…टीवी, फ्रिज, पलंग, चूल्हा, कुकर, एसी, इन्वर्टर सब की सेल डबल हो गई। हर चीज के लिए उद्योग ने दो कारखाने लगाए, किसानों ने हर साल दो फसल लगाए। कंज्यूमर दोगुने हुए, माल की गुणवत्ता चौथाई हुई, उत्पादक सोलह गुने हुए और दाम चौंसठ गुने हुए। सब चीजें डबल हुई, तो मरम्मती का काम डबल हुआ। माल की गुणवत्ता घटी तो हताशा बढ़ी, विवाद बढ़े, प्रतिस्पर्धा और ईर्ष्या घनी हुई, संवाद घटे। अपराध की नई वैराइटियाँ आयीं, न्याय की डिमांड बढ़ी, मुआवजे का चलन बढ़ा! रोजगार के नए अवसर बने। नई वृत्तियों का प्रसार हुआ, बीमारियाँ बनायी गईं, उपचार हुआ, गतिशीलता का प्रचार हुआ, नयेपन का नैरेटिव धुंआधार हुआ।
अब कारोबार इतना बढ़ गया कि डायरेक्टर के भी दस-बारह और रायता रिक्रूटमेंट हुए। अब सबका एक महाडायरेक्टर मिल्की वे के ऑफिस में बैठता है। हमारे फ़क़ीर इंटरनेशनल के पुराने डायरेक्टर साहब हर रविवार के रविवार नज़र और वक़्त बचाकर, दिल्ली का फ़ेमस मोमो खाने जाते हैं, कहीं अगर किसी ने देख लिया तो कहीं मिल्की वे के ऑफिस में सफ़ाई देने न जाना पड़ जाये! चलो कोई बात नहीं पर तीन को तेरह बनाने में उसका तो योगदान अमर हो ही गया!


















