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केसरिया भारत: राष्ट्रीयता के पक्के रंगकेसरिया भारत: राष्ट्रीयता के पक्के रंग

मूर्ख-पत्रिका

परदूसन

अगर आपको भूख लगे तो क्या आप लौकी के लौकी होने तक भूखे रहेंगे? तब तक हमारे कारखाने में पूरे शहर के एक महीने का रसद सील हो चुका होगा। अब मिट्टी दूषित होती जा रही है, वहीं हमारी मशीनें और भी एडवांस! अपन तो हैं ही! जब तक सूरज चांद रहेगा, धरती पर ये भांड रहेगा! ठोको से फोटो तक, खुमारी से लेकर पूरी तरकारी तक, जब तक आप एप्लाई करेंगे, तब तक हम सप्लाई करेंगे!

अपने प्यारे प्रातः जूतनीय, फ्री फ्री ४२० बार, मादर के चादरनीय बिल्लू जी अधोद्वारी, अपनी लैपटॉप अपनी जंघाओं में घुसाए, काली मुर्राह भैंस का खालिस सफेद दूध पीकर अभी सुप्तासन में गए ही थे कि भैंस ने तौलकर डेढ़ किलो गोबर रसीद दिया। बिल्लू जी हड़बड़ाकर उठे और गोबर देखकर दुख कातर हो गए। बिल्लू जी ने लैपटॉप जांघों के बीच से निकाली, जीभ से उसे साफ किया और भैंस से बारह फीट दूर चले गए पर मन में लोक कल्याण की प्रेरणा जाग उठी। दूध हो पर गोबर न हो! …

ऐसा ही कुछ मेरे साथ हुआ। एक रोगी मेरे पास आया, बोला, कि उसका जिया धक धक करता है। हमारी डॉक्टरी बताती है कि जिया जब भी धक धक किया तो उसके पीछे होता है कोई बेदर्द पिया। हमने रोगी को कहा कि पलट जाइए और पूँछ उठाइए। आला लगाते ही जैसे हमें धड़कन सुनने को मिलती कि एक नाग ने विषैली फुफकार मारी और आला हाथ से, प्राण प्राणनाथ से विलग हो गए। उसके बाद हमें, आधे घंटे बाद होश आया।

‘क्या खाकर आए हो बे?’, उसने बोला कि कल माता जी ने मूली के पराठे, मूली की चटनी, मूली के अचार से साथ परोसे थे। मूली को मूल में लेकर घूमते रहो! हमने तभी सोच लिया कि मंत्री जी को बोलूंगा कि बिल लाएं और मूली को अखाद्य पदार्थ घोषित करवाएं। मूली उपजाने वाले को सूली पर चढ़ाया जाए…लेकिन क्या इतने भर से कल्याण होगा?

इनपुट आउटपुट का प्रत्यक्ष संबंध है। कुछ ऐसा हो कि इनपुट हो, आउटपुट हो, पर गार्बेज वैल्यू न आए। उदाहरण के लिए, आदमी ने भात खाया, सलिनदर उठाया! सलिनदर उठाना इज गुड बट उठाते हुए जो सम्पीड़ित वायु उन्मुक्त हुई, आई मस्ट टेल यू, इट वाज नॉट गुड एट ऑल! इससे भी न हुआ तो सब्जेक्ट ने संडास में जाकर भोर की भोर नाच कर दिया। इट इज डर्टी पिक्चर गायज़!

हमें शोध करना होगा, एक ऐसा खाद्यान्न बनाना होगा कि पेट भी भर जाए और अपशिष्ट भी न आए। इस खाने से बल और बाल सब दो गुने खुद बढ़ेंगे, छोटी आंत के साथ बड़ी आंत की जगह शेयर कर, मिसलेनियस काम लिए जा सकेंगे। गुदाद्वार में सामान लाने, ले जाने का काम किया जा सकेगा…माने किया तो अभी भी जा रहा है पर ज्यादा सरल और सुविधाजनक हो जाएगा। मूत्रमार्ग पर ट्रैफिक कम होगा और उसे स्पेशलाइज्ड रूप से एक ही काम करने की जरूरत रहेगी। दुनिया में जल, मृदा, वायु आदि तत्वों में प्रदूषण भी कम होगा। आप सोचिए कि दुनिया में एक साथ अरबों लोग अगर अधोद्वार खोल लें तो ओजोन का होल ही बड़ा न होगा बल्कि धूमकेतु और क्षुद्रग्रहों के मार्ग बदलने का और धरती पर हिमयुग आने का खतरा भी है। क्या हम चाहते हैं कि मानव सभ्यता मिट जाए…नहीं! तो हमें मानव के तंत्रों का परिष्करण करना जरूरी है।

अब अगर हमें डेढ़ दो हजार रुपए हर महीने मिलें तो शोध जल्दी परिणाम लाएगा। मानव गोली खायेगा और उड़ान भर कर चाँद पर पहुँच जाएगा। धरती साफ, चाँद भी साफ! एक गोली, दो वक्त, हॉफ और हॉफ! लेकिन हम जीरो कचरा के स्तर पर एक दो दशकों में जब तक पहुंचे, तब तक मानव को इतना तो सहना होगा! हर पंद्रह मिनट पर उसके मुँह से एक ढकार आएगी, जिससे हाइड्रोजन गैस की उतनी ही मात्रा निकलेगी, जितनी वर्षा की एक बूंद के एक हज़ारवें हिस्से में होती है, बस आपने बीड़ी फूंकने के वक्त नहीं डकारना है, वरना विस्फोट होने की संभावना रहेगी। चिंता न करें, हम आगे, बिना आग वाली बीड़ी पर भी रिसर्च करेंगे क्योंकि हमें मालूम है कि आपका शौक, हमारे लिए बड़ी चीज है!

ना-ना! ठीक है कि लौकी की तरह गोली पौधे पर नहीं लगेगी। कारखानों में बनेगी पर ये ज्यादा बेहतर होगा। अगर आपको भूख लगे तो क्या आप लौकी के लौकी होने तक भूखे रहेंगे? तब तक हमारे कारखाने में पूरे शहर के एक महीने का रसद सील हो चुका होगा। अब मिट्टी दूषित होती जा रही है, वहीं हमारी मशीनें और भी एडवांस! अपन तो हैं ही! जब तक सूरज चांद रहेगा, धरती पर ये भांड रहेगा! ठोको से फोटो तक, खुमारी से लेकर पूरी तरकारी तक, जब तक आप एप्लाई करेंगे, तब तक हम सप्लाई करेंगे!

आइए हम मिलकर धरती को संडास फ्री बनाएं! मूली तो तत्काल गैरकानूनी सिद्ध होगी, देखते रहिए!

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