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केसरिया भारत: राष्ट्रीयता के पक्के रंगकेसरिया भारत: राष्ट्रीयता के पक्के रंग

जेन जी-डी-पी

रोज-गाड़

इसके बाद चर्चा जोर से चली कि चाय मंडली में, कम चाय वाले स्वामी को न केवल चाय कम देकर बेइज्जत किया गया, अपितु…अपनी चाय ऑफर करने की क्या जरूरत थी? अगला चाय का इतना भूखा है क्या? ऐसी चाय तो उसके पालतू पीते हैं…बताइए तो! राम राम!

ये दो पड़ोसी मकान हैं… दोनों के सामने गाड़ियाँ हैं, अंदर रंगी पुती नारियाँ हैं… फूल पौधों की क्यारियाँ हैं…

‘ साला बड़ी बरियार हो गया है दोनों! ‘ सामने पान खैनी की दुकान पर खड़े होकर ताऊ ने कहा।

‘ बड़ी लहकता है महराज! देखल नहीं जाता! हमलोग को कोई आंट नहीं देता! ‘

‘ आंट और दांत का बात नहीं है भकचोनहर! साला किसी को खरीदने के लिए आपके जेब में सामने वाले की माँग से ज्यादा पैसा चाहिए!…’

‘ माँग?’, उसने सामने खड़े बंगलों की तरफ देखा।

…थोड़ी देर माहौल में चुप्पी रही।

‘ दोनों को चाय पर बुलाओ!…इसी दुकान पर!’

बहरहाल, दोनों स्वामी चाय पीने के लिए दुकान पर पधारे। कुछ और दर्शक भी आए थे, मीडिया वाले भी थे, आर्केस्ट्रा भी था।

ताऊ ने आँख मारी। चाय वाले ने एक प्याली में, दूसरी प्याली की अपेक्षा चाय कम डाली…बिल्कुल थोड़ी सी कम!

‘ अरे साला! यहाँ आओ तो! ‘, ताऊ चिल्लाया।

चाय वाला कुछ बोले, इससे पहले ही ज्यादा चाय पाए स्वामी ने कम चाय पिए स्वामी से कहा, ‘ लीजिए साहब! …और ताऊ तो भी क्या बेचारे चाय वाले को…’

‘ क्या बात करते हैं महराज! बच्चा जैसा नाप जोख! चलिए अपनी अपनी सुरकिये!’

मंडली उठ गई। ताऊ ने लंबी साँस ली।

…धत् साला! बेइज्जत कर दिया महराज!

इसके बाद चर्चा जोर से चली कि चाय मंडली में, कम चाय वाले स्वामी को न केवल चाय कम देकर बेइज्जत किया गया, अपितु…अपनी चाय ऑफर करने की क्या जरूरत थी? अगला चाय का इतना भूखा है क्या? ऐसी चाय तो उसके पालतू पीते हैं…बताइए तो! राम राम!

दोनों स्वामी के कानों में चर्चा गई। ज्यादा चाय पाने वाले ने सोचा कि कम चाय पाने वाले से बात कर सब रफा दफा किया जाए, आखिर दोनों को साथ रहना है, पड़ोसी हैं। एक – दो बार कोशिश भी की।

एक तो चाय मंडली में बेइज्जत किया, अब तो टोक टोककर बेइज्जत कर रहा है।

कम चाय पीने वाले चाचा का ईगो हर्ट हो गया।

‘ डायरेक्ट एक गोली से बुखार दूर हो जाता है! इस इलाज से समाज चल पाता है! ‘ ताऊ ने कुछ और सोच रखा है।

‘ तुमको चाय कम दिया पर बुद्धि तुमको ज्यादा दिया है भगवान!’, ताऊ ने कहा, ‘ बांकी हम हैं ही!’

इसके बाद, ज्यादा चाय पाने वाले स्वामी के घर आउटसोर्स लोग ज्यादा आने लगे।…ज्यादा चाय जो मिली है, चाय का मान रखना ही है।

इसके बाद बुजुर्ग लोग गुजर गए, बच्चे जल्दी बीमार पड़ने लगे। घर में टेंपररी कल्चर चरम पर था। इसी बीच स्वामी…

घर में कलह होने लगी, स्वामी जी रोज पार्टी करते हैं होटल में, पत्नी को गंदे हाथों से गूंथे आटे की रोटी खानी पड़ती है! अब स्वामी और अधिक रफूचक्कर रहने लगे। खर्च ज्यादा हुआ तो कमाई अधिक चाहिए, उसके लिए मेहनत और समय ज्यादा चाहिए। इसके बाद, भिन्न तरह की खुराक भी चाहिए।

पड़ोस में शीतल पेय का इंटरनेशनल ठेका खुल गया। ऊपर थोड़ा स्थिर होने लायक जगह भी थी। स्वामी यहीं पड़े रहते रात भर। एसी का किराया, सूसू पोट्टी साफ करने का खर्चा, टांगकर घर पहुँचाने की सुविधा…इतने में तो…

अब इंटरटेनमेंट की भी व्यवस्था थी…अब इंटरटेनमेंट के दौरान टेन टेन टेन कौन गिनता है…सूसू पोट्टी का, एसी का, बिस्तर की ऐसी तैसी का…सब का शुल्क है!

एक दिन स्वामिनी जी नगररक्षकों के पास पाई गईं। लगा था कि स्वामी तीन दिनों से गायब हैं और अब आए हैं तो इच्छा है कि तीन दिन ही क्यों गायब रहे! रक्षकों ने कहा कि, वो लौट आओ पूजा करवा देंगे पर कुछ सामग्री लगेगी जैसे बंदर का पंजा, मुर्गी की कलेजी, कुक्कुर की खोपड़ी, धूप अगरबत्ती, दो तरबूज… खंडहर के पीछे वाले कुएं के किनारे साधना करनी होगी!

अब इतनी महंगी साधना करके इस खटाहरा स्वामी को कौन पाए? सस्ते में थर्ड पार्टी उपलब्ध हैं, कस्टमाइज्ड सुविधा है!

रक्षकों ने भाँप लिया…उन्हें मालूम है कि ये थर्ड पार्टी, उनका लुलु-पाचा ( चारा) है!

इधर थर्ड पार्टी की थर्ड क्लास एक्टिविटी और उधर थर्ड ग्रेड के एंटरटेनमेंट दोनों का संगम पुनः रक्षकों के आँगन में हुआ। ताऊ ने थोड़ा मीडियेट किया, कंचन कामिनी की कीमत है, मोल तोल तो होगा ही।

इसके बाद अवसादग्रस्त अधिक चायग्राही स्वामी और स्वामिनी इंक्लूडिंग परिवार पहले मानसिक स्वास्थ्य के लिए प्रवृत हुए, फिर थोड़े समय हवा बदलने गए, फिर मरूस्थल गए, देवस्थल गए…घर लौटे तो पुनः वही कारोबार!…वही शीतल पेय का भंडार और वही हुस्न धुआँधार!…इट इज नॉर्मल नाउ!

हमार मरद त बहुत कमात हे, ससुरी महंगी डायन सब खा जात हे! महंगी डायन को भी पूरा क्रेडिट देना गलत है…रसोई से रजाई तक जब कस्टमाइजेशन, परफेक्शन और कैलकुलेशन हो तो प्रोफेशनलिज्म तो आयेगा ही!

…अरे तोरी के! क्या झक्कास है यार! साला, चाय भी ज्यादा और चाशनी भी!… ताऊ जी कहे थे कि इसकी चादर मोड़ देंगे और उल्टा यहाँ…कम चाय पाने वाले स्वामी की सुलग गई और वो ताऊ को बुरा भला कह आया।

…उसकी मौगी को बहुत आराम है! तेलयटो वाला उसके तलवे में तेल की मालिश करने आता है…दो रसोइया खाना बनाता है…दो शाम का बर्तन वासन, फूल पौधे, बिजली बत्ती…हम तो गरीब लोग हैं! अपने मरद को भी बोलते हैं कि मेहनत करो, घर भरो! ये तो उस दोमुंहे ताऊ के साथ मुँह काला करता फिरता है।

ये तो मुसीबत हो गई! कम चाय पाने वाले स्वामी ने घरारी और परिवार की बात सुनी तो उसका पसीना चलने लगा…ये लो! आज तो आउटसोर्सिंग के लिए दंगल ही हो गया! पत्नी ने ताल ठोंकी है, तुम करो या करवाओ किसी से?

कमोड जीभ से कौन साफ करता है यार!…भगवान ने पड़ोसी को उसकी जिंदगी में मुसीबत खड़ी करने के लिए ही भेजा है, उसे भगवान के पास भेज देने में ही लाभ है। ताऊ लुच्चा है, कहता है कि बर्बाद कर दिया उसे, हाँ, हुआ भी है पर वो तो बर्बादी तक एंजॉय कर रहा है! अब यहाँ मेरा…

ताऊ ने बोला, न! ठीक नहीं होगा ये सब…

उपाय बताइए, सलाह मत दीजिए। आप सलाह देने का भी पैसा खाते हैं, आपसे बेहतर तो सड़क का भिक्षुक है, एक पैसा में एक करोड़ का आशीर्वाद देता है।

अमरीका से मंगवाना पड़ेगा!…खर्चा है। ताऊ ने सर खुजलाकर कहा।

है क्या?

एक लाल पिचकारी है! गाँव पर पिचकारी से रंग लगा देना..बस!

…बस!

ताऊ ने अमरीका फोन लगाया, ऑर्डर कल माने टॉम- रो डिलिवर करिंग एट एनी हाउ कॉस्ट! आई नो, फोर्टी थाउजेंड डॉलर्स! आई एम टेलिंग एट एनी हाउ कॉस्ट, इट्स इमरजेंसी!… ओके! चलिंग! फोर थाउजेंड डॉलर्स एक्स्ट्रा फॉर इमरजेंसी सर्विस!

स्वामी बोला, चलेगा।

भेजिंग! वेटिंग! ओवूलेटिंग! थैंकिंग! ताऊ सम्मुख, आँख मारी।

कम चाय पाए स्वामी ने ताऊ की तरफ फिर से देखा।

सेवा!

फिर एक रात, साढे तीन बजे। शीतल पेय भंडार के ऊपरी मंजिल की बत्ती जली! नीचे से एक गाड़ी निकली। गाड़ी बीच चौराहे पर रुकी। अधिक चाय पाने वाले स्वामी, कचरे के डब्बे के बगल पाए गए…फिर शांति छा जाती है। अचानक एक आहट!  फिर वस्त्रों के सरसराने की आवाज! फिर पिच-पिच…पिच-पिच…

इतना ही कर के त्याग देना था! इतनी शत्रुता भी ठीक नहीं! पिचकारी मुँह पर क्यों मारी। शक्ल पहचानेगा कैसे कोई!

सुबह साधो साधो हो गया। अधिक चाय पाने वाले साहब को स्वर्ग से साक्षात देवराज इंद्र ले जाने आए थे। स्वामी जी ने कहा कि वो कुछ सौ साल हिमालय के चोटियों पर चायपत्ती की खेती पर शोध करने के इच्छुक हैं। इन्द्रदेव ने उन्हें हिमालय सौ साल के लिए एक रुपए शुल्क लेकर लीज पर दी है, हर सौ साल पर एक रुपया अदा करके इसे एक हजार साल तक बढ़ाया जा सकता है।

अरे साला! गप तो गप, ताऊ भी बोल रहा है! अरे ताऊ, ओकरा त!…

ऊ कोई और रहे…स्वामी जी तो महान हो गए!

अरे महराज! आव से लेकर गाँव और गाँव से लेकर घुमाव, सब रंग दिल्ही भिया!

… उ कोई गरीब आदमी रहे! मुर्दखाना में मिलल है।..चल पहचान करा दे! देखें…गलत हुआ तो तुमको स्वास्थ्यलाभ करना पड़ेगा!

गलत कैसे! हम साबित कर देंगे भाई!

चुनरी उठाई गई…अंदर लाल रंग से मुँह रंगे ये स्वामी ही थे! …

यही है।

तो क्या! मुँह लाल है! पहचान कहाँ आ रहा है?

कम चाय पाए स्वामी ने कहा, पीछे!…

कहाँ कुछ है पीछे?…

ओकर पीछे?

कहाँ… किसके पीछे?… ताऊ अंजान बन रहा है।

कम चाय स्वामी पागल की तरह चुनरी नोचने लगा।

अच्छा!…तो बोल रहे हैं पीछे…ये पीछे!

लाल…

उतना लाल नहीं है…इतना लाल से क्या होगा…

अब कम चाय पाने वाले स्वामी पूरा पगला गए। उन्होंने पिचकारी निकाली। आप ही दिए थे न ताऊ!…दिखाते हैं!

अपना पर दिखाओ! हम अपना कैसे देखेंगे!

पिच-पिच! पिच-पिच… पिच…

लह!

ताऊ ने कहा, लिटा दो इसे भी!

अब कुछ समय बाद!

एक हवेली ध्वस्त हो गई, जो कम चाय पाने वाले स्वामी की थी… वहाँ अब धरती तो मून सीढ़ी लगी है! लोग पहले नीचे जाते हैं, फिर ऊपर जाते हैं। सीमाबंदी हुई है, बाउंड्री प्लास्टर किया गया है।

बगल वाली हवेली जो ज्यादा चाय पाने वाले स्वामी की थी, उसे पहले संग्रहालय बनाया गया, फिर जब भीड़ नहीं जुटी तो फिर समन्वय से काम लिया गया। प्रचार हुआ कि बगल से चंद्रयात्री बिना खिड़की दरवाजे के इस संग्रहालय में आते, ठहरते, चाय सिगरेट करते और कुछ धमा चौकड़ी मचाकर चले जाते हैं। बेसिकली पैरानॉर्मल रिसर्च सेंटर।

घर की स्वामिनियां अब शीतल पेय भंडार में शिफ्ट में ड्यूटी करती हैं, बच्चे क्रिएटिविटी के लिए घाट घाट पर पानी पी रहे हैं और …

ताऊ जी सेवानिवृत्ति से पहले दो फाइव स्टार होटल, एक फार्महाउस, तीन पेट्रोलपंप और…

ताऊ जी आज भी खैनी उसी तरह लगाते हैं! ससुर, न तो राज करना था, न काम काज करना था, सेटल अपना आज करना था। अस्सी चुटकी नब्बे ताल! जिसकी फैक्ट्री, जिसका माल! अपना केवल एक सवाल!…

पान खैनी की दुकान वाला बड़ा सदमे में है, साला अपन पान और खैनी हम नहीं खाते और ई ताऊ त सगर….

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