दीदी के प्रवास पर मुर्दा मर्द के विचार!
…और चलाइये दर्जन भर डेढ़ टांगिए पंखे! छत वाले पंखे को चूसकर रद्दी में बेच दिया! ऐसे एसी चलाया कि एसी फट गया! भगवान बचाये इस गर्मी से! … इतनी धूप में मेरे जैसे मर्द एक केला लेकर बाजार से घर आते हैं कि केले का कोफ्ता बन सके। मैंगो शेक मिलता है, ओरेंज जूस मिलता है, नारियल पानी सब से नजर फेरकर पार होते हैं लोग, सब सिर्फ इसलिए कि अकेले गला तर करना नैतिक अपराध है!
यहाँ घर में आइने के आगे बैठे हुए! बीस पंखों में लेटे हुए, करोड़ों का बिल उठाना और बिना डकार दिन में ग्यारह बार चाय पी जाना कहां का न्याय है! … और तो और! डेढ़ किलो का मुर्गा! बारह किलो का लहंगा! छह इंच मोटा मेकअप, बारह बाई बारह के रूम में आधे दर्जन लोगों का गेटअप!…अंटार्कटिका तो कम है! प्लूटो से कम का हिसाब नहीं होना था! ये तक नहीं मालूम कि बिल पंखे का है, कूलर का है या ऐसी का है? … महराज, रूम हीटर और एसी गर्मी में साथ कौन रखता है? रूम धुआं धुआं हो जाता…ससुर घर क्या समूचा मोहल्ला जल जाता! वो तो अच्छा हुआ कि बर्फ की सिल्ली से अब चेहरा साफ करेगी! लेते रहो ठंडक वहीं, वरना यहाँ कितनों को बर्बाद करोगी! इतना मांस और चर्बी है कि एक बार में एक शेर न खा पाए! अरे थोड़ा खुद पर काम कीजिए, नियम संयम से रहिये, चित्त की चंचलता शांत कीजिए।
अब दोष मत दीजिए दुनिया को! लोगों को जान और बिजली दोनों बचानी है! जिंदगी सिर्फ कहने के लिए चार दिन की कहानी है! अब अंटार्कटिका में रहकर गिनिये कि साठ वर्ष में सठिया कर भी लोग पर्याप्त जी लेते हैं और यहाँ अस्सी किलो की चर्बी बोरे में भरकर लोग असमय अपरलोक गमन कर लेते हैं।























