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केसरिया भारत: राष्ट्रीयता के पक्के रंगकेसरिया भारत: राष्ट्रीयता के पक्के रंग

चर्चा में

कुर्सी का मतलब

ये तो थी पुरानी बात। पर आपने कभी गौर किया है कि कुर्सी में वो क्या बात होती है जो उसे कुर्सी बनाती है? कुर्सी की जमीन से ऊंचाई, उसकी एक – दो – तीन – चार या जितनी भी हों, टांगें, उसपर का आराम, रुआब…उसकी वो, वो वाली बात।

एक बार की बात है, एक गुजरते हुए इंसान ने देखा कि एक गोले के भीतर कुछ लोगों में जबरदस्त सामूहिक लस्टम – पसटम चल रही है, गोले के अंदर ही एक जनाब कुर्सी पर बैठे खैनी लगा रहे हैं। “ये क्या हो रहा है”, उस गुजरते इंसान ने पूछा।

“ई कलाकार लोगन हैं, कलाकारी कर रहे हैं!”

उस इंसान को चिंता हुई, “ये कोई कला है? बेदर्दी से मार – पिटाई हो रही है!

“जाय दे भाई! अपन काम कर आऊ निकल!”

“कैसा जंगल है?”

“है जंगल! त? हम यहाँ के शेर हैं!…तू भाग ससुर के नाती!”

ये तो थी पुरानी बात। पर आपने कभी गौर किया है कि कुर्सी में वो क्या बात होती है जो उसे कुर्सी बनाती है? कुर्सी की जमीन से ऊंचाई, उसकी एक – दो – तीन – चार या जितनी भी हों, टांगें, उसपर का आराम, रुआब…उसकी वो, वो वाली बात।

लेकिन कुर्सी की सहूलियत देखिए, उसे गटर से लेकर शहर, खेत – खलिहान से लेकर मसान कहीं लगाया जा सकता है। ये जहाँ भी लगेगी, दुनिया उसे वहाँ की कुर्सी ही कहेगी। एक बात और, कुर्सी पर बैठे आदमी को सर्वत्र एक सा ही फील होता है! जी! वो कायदे से जमीन के ऊपर होता है। मसान में लगी कुर्सी या किसी भाषण मैदान में लगी कुर्सी पर कुर्सी वाले के लिए सब कुछ एक सा ही होता है। आपने कभी किसी कुर्सी वाले को इस बात पर अफसोस करते हुए नहीं देखा होगा कि वो जंगल की कुर्सी पर है या गटर की या मसान की। आपने कभी उसे अपनी जनता से ये कहते हुए नहीं सुना होगा कि, “ए शमशान के मुर्दों, कुछ तो शर्म करो! आगे बढ़ो! शमशान को शहर बनाओ! अपना और मेरी कुर्सी का भी लेवल उठाओ!” आपने जब भी सुना होगा तो यही सुना होगा कि वो कहेगा, “हे शमशान के मुर्दों, अपने मुर्दा होने पर गर्व करो! इस पुराने शमशान की विरासत पर गर्व करो! हमें इस शमशान को और भी बड़ा श्मशान बनाना है! हमें देश विदेश के मुर्दों को अपनाना है! हमें और, और मुर्दा हो जाना है।

असल में कुर्सी वाले लोग बड़े प्रैक्टिकल होते हैं। वो जानते हैं कि शमशान शहर नहीं बन सकता। जो वो है, वो वही रहे और वो कुर्सी पर बैठे – बैठे उनकी सेवा करते रहें, इसी में कल्याण है।

जो कसमसाते हैं, शमशान को शहर बनाना चाहते हैं, लिहाजा ठीक से मुर्दे नहीं हैं, उन्हें कुर्सी की जगह बदलने का कोई अधिकार नहीं है, क्योंकि वो शमशान को खंड करना चाहते हैं, जिस दिन वो भी मुर्दे हो जाएंगे उस दिन वो भी कुर्सी की जगह बदलने के नहीं, यहीं कुर्सी पर बैठने के आग्रही हो जाएंगे। कोई बात नहीं कि शमशान वाले शहर जायेंगे तो उनकी थू – थू होगी, जब शहर वाले शमशान आयेंगे तो उनकी भी धू – धू होगी! सब कुछ अपने भीतर है! शमशान होने का गौरव, सुख, सब कुछ भीतर है, बाहर वाले अपनी तालियों से किसका घर चला देते हैं! सब मोह माया है!

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