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चर्चा में

दुख के कारोबार

असल में दुख के यूनिवर्सल होने में बहुत कुछ होता है, आपको एक गाड़ी चाहिए, मोटे दीवार वाले मकान चाहिए, कुछ ज्यादा ही व्यस्त पड़ोसी चाहिए, कॉर्पोरेट/व्हाइट कॉलर नौकरी न हो, रियल लोगों से रियल टाइम कम से कम संपर्क हो…हो भी तो मॉडरेटेड हो! ये सब प्रबंध दुख के छोटे से बड़े होने तक के दौर में बहुत जरूरी हैं।

नौकरियां कम होने के बाद स्वरोजगार के तरह तरह के विकल्पों पर विचार किया जा रहा है। ऐसा ही एक विकल्प मुझे मिला जब किसी ने मुझे वाट्सएप पर मेसेज फॉरवर्ड किया।

दुख सुनने के लिए फीस लगेगी, मामूली दुख के लिए कम धनराशि, दुख के ज्यादा परिमाण के लिए अधिक धनराशि और दुख में शामिल होकर रोने के लिए थोड़ा और मूल्य लिया जाएगा।

पहले के युग में लोग ये दुख ऐसे ही सुन लिया करते थे, आजकल की बात निराली है। पहले लोग इधर का दुख सुनकर उधर और उधर के दुख को इधर सुनाकर भिन्न भिन्न तरह के लाभ लिया करते थे। कई बार ऐसे लोग समाज में तरलता लाते थे, उन्हें इससे सम्मान मिलता था, गप्प का आधिक्य होने के कारण उन्हें किसी के द्वार पर सहज ही कुर्सी और चाय मिल जाया करती थी। इन लोगों के मस्तिष्क की शक्ति भी बढ़ती, समाज में स्थान और मानवीय गुणों में वृद्धि होती। हमारे पड़ोस की चाचियों ने हाल तक ये गुण बचाकर रखा था। इनके प्रयासों के बदौलत आस पास की बेटियां भागने से पहले पकड़ी जाया करती थी। ये किसी भी होनी का पूर्वाभास दे दिया करती थी।  इधर का दुख उधर और उधर का दुख उधर…बोलें तो दुख या बातें…चौकन्ने लोग…पारखी दृष्टि!

अब समय बदल गया। माँ बाप के पास बच्चों के लिए समय नहीं, बच्चों के पास माँ बाप के लिए समय नहीं। भाई बहन के पास एक दूसरे के लिए, पति पत्नी के पास एक दूसरे के सुनने की इच्छा नहीं, दोस्त वगैरह तीन कौड़ी के… पड़ोसी और सहकर्मी छिपे हुए शत्रु! अब दुख सुने कौन?

आने वाले समय में और भी ऐसे रोजगार आने वाले हैं। आज भी बड़े लोग डॉक्टर और मनोचिकित्सक को भारी फीस आदर सम्मान के साथ देकर आते हैं, सिर्फ दुख सुनाने के लिए और जब उनके दुख को मेडिकल लैंग्वेज में बताया जाए तो दुख भी उदात्त फील होने लगता है…नहीं! अब साधारण भाषा में कहें कि, “मेरी उनसे दोस्ती थी, फिर मेरी उनसे दोस्ती हुई, फिर मेरी दोस्ती सबसे हुई, फिर सबने अपने अपने एक्सक्लूसिव दोस्त बना लिए!”

अब डॉक्टर ने इतनी पढ़ाई कर रखी है कि इस दुख को दोस्ती से हटाकर केमिकल और फिर स्ट्रगल और फिर यूनिवर्सल बना सके। दुख यूनिवर्सल हो जाने के बाद तो समझिए कि राज्य सभा की सीट मिल गई! अगर कोई तबियत से हग भी ले और वो वाइरल हो जाए तो बस…

असल में दुख के यूनिवर्सल होने में बहुत कुछ होता है, आपको एक गाड़ी चाहिए, मोटे दीवार वाले मकान चाहिए, कुछ ज्यादा ही व्यस्त पड़ोसी चाहिए, कॉर्पोरेट/व्हाइट कॉलर नौकरी न हो, रियल लोगों से रियल टाइम कम से कम संपर्क हो…हो भी तो मॉडरेटेड हो! ये सब प्रबंध दुख के छोटे से बड़े होने तक के दौर में बहुत जरूरी हैं।

छोटे छोटे दुखी लोग जिनके पास दुख सुनाने के लिए ज्यादा प्रबंध न हो, उन्हें छोटे छोटे दुख श्रोता उद्यमी काम लायक उपाय है। लेकिन समस्या सिर्फ इतनी नहीं है।

सामान्य आदमी के दुख कई प्रकार के होते हैं। जैसे, उसकी नानी मर गई, उसकी बहन की बारात लौट गई, उसका बेटा बेरोजगार है, खेत बिक गए, घर में टीन कनस्तर खाली हैं, बेटी कटा हुआ केला खा रही है, उसका अपना संतरा सड़ा निकल गया, घर के लॉक का की होल बड़ा निकल गया। ये सारे दुख बड़े क्रिटिकल और खतरनाक होते हैं, संक्रामक भी। तभी, इन दुखों को सुनने वाला इंसान दीर्घ काल तक यश पाता है।

कुछ दुख थोड़े अलग होते हैं, जैसे कि पड़ोसी के जमीन में तेल का कुआं निकल गया, दोस्त ने जर्सी गाय पाल ली, अमुक की बकरी को समुक ने दूह लिया…

इस तरह के दुख में, जिसमें कोई थर्ड पार्टी संलग्न होती है, उसे सुनने में थोड़ी दिक्कत है। यहाँ प्राइवेसी मैटर करता है, कुछ कानूनी पेंच फंस सकते हैं। इस तरह के दुख सुनने से स्थाई यश व कीर्ति भी नहीं मिलती। असल में ऐसे दुख, पूर्णतः दुख भी नहीं होते। ये कुछ और होते हैं।

औरों की श्रृंखला में एक और श्रेणी है, गॉसिप किस्म के दुख। ये किसी बड़ी पार्टी की, के लिए किए जाते हैं। ये हानिरहित होते हैं और इनको सुनाने के लिए पैसे देना, यू ट्यूब का पैक लेने जैसा है। ये सुनने के लिए हर कोई यूं ही तैयार है।

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प्रस्तुति एवं COPYRIGHT © 2022 MRITYUNJAY MISHRA