दीदी के प्रवास पर लेखक महोदय के विचार!
दीदी तुम सब जिंदों का श्राद्ध करो।
सबकी कब्र सजाओ, मुर्दों को आबाद करो।
लू में तुम दर्जन भर पंखा चलाती रहो,
एक साथ चौदह की हवा भी खाती रहो!
पंखे नहीं, तुम्हें अब खुद पंख ही क्यों न मिले,
उड़ो जितना जी, सीमा अनंत ही क्यों न मिले!
बिल कटते हैं कटा करें, दिल भरे तो भरा करें,
जलने वाले जलते जलें, जल-जल कर मरा करें!
ये शीतलता की, शुचिता की अदम्य चाहत है,
क्यों जग सारा कातर है, कैसी ये घबराहट है!
ये शरीर, ये साड़ी, मर्यादा बड़ी भारी!
लू का तीक्ष्ण रूप, उम्र जलती सी धूप!
कोई क्या-क्या भूले, क्या अब कोई याद रखे,
कितना अवधान करे चित्त का औ क्या अब याद रखे।
तन का मैल स्वेद है तो मन का है ये आँसू
गिर गए दोनों तो क्या, क्यों, किसको मै ये बाँचू?
जब जब जग ने दीदी को है भट्टी में तपाया
दीदी का रूप फाड़कर कुंदन सा बाहर आया।
है दीदी तो जग में हर ओर बस पंखे ही पंखे हैं,
शीतलता है, कुल्फी, शरबत में डूबे हुए चमचे हैं।
हाँ-हाँ! दीदी तुम गमन करो छिद्रित सतह ओजोन से,
पलायन करो, धूम्र-धूप ज्वाला के मध्य मौन से!
विहार करो, शुभ्र, दिव्य,भास्वर, चकमक जग में,
सुख पाओ, दुख निबटे तेरा, बढ़ते तेरे पग पग में!
ठण्डक हो, बिन बंधक हो, जीवन हो तेरा जगमग में।
है ग्लानि कि मैं पंखा नहीं बस एक फटीचर छाता हूँ,
किंतु मै भी छाता हूँ, उष्णता से चैन दिलाता हूँ!
कभी किसी जन्म में धूप तले मुझे भी अनजाने बुलाना,
केशों को ढंकने मुझे तुम धूप में सहर्ष सुलगाना।
मैं तप्त, छिद्रित, वक्र सब होकर भी चलूँगा।
तुम्हारी छाया को सब सहूंगा, नहीं कहूंगा!
कि हम सफ़र भर एक दूजे के साथ रहे,
उष्ण में तपता रहा, पकड़े निर्द्वंद्व मुझे तेरे हाथ रहे,
हम मिले न मिले, हम ही मिले, इतना तो याद रहे!
चिह्नित करना मुझे ही अपराधी, सबूत तुझपर वार रहे।
शिनाख्त कर लेना मेरी, जितनी लंबी कतार रहे।






















