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केसरिया भारत: राष्ट्रीयता के पक्के रंगकेसरिया भारत: राष्ट्रीयता के पक्के रंग

मूर्ख-पत्रिका

डाइनिंग साथी

‘मोक्ष मिला, किसी ने नहीं देखा! मौज तो मिली! मुक्ति मिलेगी, कोई नहीं जानता! मस्ती तो मिली!’ उसकी बेस्टी ने उसे समझाया था। मेरी दोस्त भी समझ गई। वो ठीक ही कह रही है, उसके पास हर वैरायटी की साड़ी है, सलवार सूट है, तेल पाउडर है, मेकअप का हथियार है, रंग रूप है। तरह तरह के सौंदर्य प्रसाधन, कपड़ों का संग्रहालय, चमड़ी से बने, दमड़ी से भरे बैग, हुस्नपरी होने का टैग! इस विविधता भरे माहौल में, एक शिशु ही कम है, बांकी सारी सेटिंग एकदम जबदस्त है।

सखी बोली, ‘अब सोच! कल अगर तुझे बच्चे न रहे तो तू सोशल क्लब और पार्टीज में कैसे जाएगी? तेरे पास गॉसिप करने की वजह भी कम होगी! बाकी सब चीजें पुरानी पड़ जाती हैं! कैसे मालूम चलेगा कि क्या नया फैशन है! आज के वक्त, बच्चे, नए पुराने लोगों से मिलने के सस्ते, सुविधाजनक और सबसे सेफ बहाने हैं!’ मेरी दोस्त को ये बात अच्छी लगी, बच्चे को लेकर, देकर, लव लेटर पहुंचाने का रिवाज तो वैसे भी पुराना है। बच्चे प्रेम की उत्पत्ति ही नहीं, प्रेम के अवसर, प्रेम के स्क्रीनशॉट और प्रेम के वाहक भी होते हैं! प्रेम हैं तो बच्चे हो सकते हैं, वरना बच्चे भी नाहक होते हैं। दुनिया से जुड़े रहने के लिए, एक पास या टिकट सा, बच्चा जरूरी है! हो सकता है कि कल को फ्लेवर या कलेवर बदल जाए, ऐसे में बच्चे का सेटअप जरूरी है।

ये थी, हमारी प्राणप्रिया सखी की कहानी। उसने एडल्ट होते ही पापा से प्यार मांगा। पापा को जब तक समझ आता, उसने गली से एक डॉगी पकड़ लाया। लेकिन थी खुश! डॉगी रोज रात में उसके तलवों को अपनी नौ इंच लंबी जीभ से गुदगुदी करता, तब उसे नींद आती। फिर सखी ने डिग्रियां ली और माेयो होटल में नौकरी की। इसी बीच जिंदगी के कठिन दौर आए। कभी वो तीसरी रात डेरे पर आती, कभी रात में अढ़ाई बजे चूल्हा जलाती! डॉगी बेचारा जो मिले, खा लेता, जब मिले, जीभ से उसके तलवे सहला लेता। जब सखी का मूड स्विंग होता तो वो जोकर बन जाता, जब कभी वो दर्द में होती तो वो नौकर बन जाता। दुनिया में सब कुछ बदला, नौकरी आई, गई, आई, लिपस्टिक सस्ती और छोटी हुई, पाउडर की परत मोटी हुई, रुमाल फैलकर धोती हुई, आईना देखना चुनौती हुई, प्रोटीन की डब्बा महंगा हुआ, हैसियत के बाहर लहंगा हुआ पर एक चीज बनी रही, वो चीज थी, डॉगी का केयर।

एक बार पड़ोसी के जवान लड़के ने उसे आंटी कहा, डॉगी ने बस आव देखा न ताव, उसे रेबीज रसीद दिया। एक बार परिचित की परिचिता ने उसे देखकर कातिलाना जलवा क्या दिखाया, डॉगी ने उसकी सैंडल गीली कर दी, जो कोई उसकी प्रिया को तौले, उसके घर की पाँव-दान पीली कर दी। लेकिन…

‘पापा नहीं मानेंगे कुत्तु!…पापा नहीं मानेंगे!’, मानो कुत्तु ने अपनी भोली आँखों से उससे पूछा हो कि अब मनाना किस बात के लिए है! एक दशक से तलवे घिस-घिसकर लाल कर दिए, इतना साफ तो मोहतरमा का चेहरा नहीं है! जीभ घिस गई! कोरोना से न हो, ऐसा टेस्ट खत्म हुआ है और पापा कुछ कर सकते हैं, अब इनको वहम हुआ है!

‘मैं क्या जवाब दूंगी अगर हमारे प्यार की निशानी, आधा या पूरा कुत्ता, या आधा इंसान हुआ तो! सबको मालूम चल जाएगा कि तुम्हारी चारों में से एक टांग में, हुए जख्म ने ही खून भरा है, मेरी Z शेप की मांग में! लोग पापा को ताने देंगे, मम्मी को चार टांगों के उलाहने देंगे! हाय! मै सह नहीं पाऊंगी, किसी से कह नहीं पाऊंगी! मैं गहरे दरिया में, गले में पत्थर बांधे बह नहीं पाऊंगी! मुझे लौट जाने दो कुत्तू!’

फिर थोड़े दिन सब स्टैंड बाई रहा। अब नौकरी की वेकेंसी नहीं मिल रही, लोगों को अब अनुभव नहीं, कमनीयता चाहिए! उन्हें थ्रेसर नहीं, फ्रेशर और उनपर परफॉर्मेंस का प्रेशर चाहिए, उन्हें रेसिस्टेंट और रेगुलेटर चाहिए। अब बहुत हो गई रायता रिक्रूटमेंट, लोगों को प्रॉफिट चाहिए…और फिर एक दिन जिन्न दुबारा निकला!

कुत्तु ने दांत दिखाकर कहा, वो उसे रेबीज कर देगा और खुद को भी… दोनों एक साथ भौंकेंगे फिर! फैक्ट की बात मत कीजिए, भीतर ही भीतर संचारित तरल, गर्म और नर्म इमोशन देखिए! अब आया जुगाड! डॉगी अब और भी ज्यादा पालतू बनने को तैयार हो गया, बदले में उसका जीवन भर का पेंशन कायम रहेगा, वो घर का एक सदस्य और सामानों में एक आइटम रहेगा।

फिर एक भैंसाराज पकड़ में आया और उसने स्वतः स्वेच्छा से, पड़ा हुआ, गंदला, छीला बाँस उठाया…वो उससे कुटिया बनाएगा और एक कुत्ता गोद में पकड़े एक…सुकन्या अंदर लाएगा। अभी ऊपर के फोटो में वो खुशहाल परिवार चित्रित है, बांकी सब चलता है, आपके संस्कार और आपकी सोच विकृत है। परिवार और डॉगी विरोधी नहीं, एक दूसरे के लिए उपयोगी हैं। डॉगी और परिवार दोनों रखे आपको संपन्न और खुशहाल, एक की शिफ्ट पूरी हो तो दूसरे को करें बहाल! देखिए कमाल! तत्काल!

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