जब विज्ञान के बनाए यंत्र में आध्यात्मिक दृष्टि बो दी जाए तो मानवता का कल्याण हो जाता है। हमारे घर से लेकर बाजार, वेश से लेकर परिवेश, देश से लेकर विदेश…हर जगह ऑक्सीजन और विज्ञान उपलब्ध है। इस विज्ञान का न केवल बाहरी जगत, वरन हमारे घर में भी इतना योगदान है कि कहने बैठें तो आयु निकल जाए। एक उदाहरण लेते हैं, धुलाई यंत्र, वाशिंग मशीन।
जिसने ये मशीन बनाई वो दुनिया के सबसे बड़े दार्शनिकों में से एक का तो पड़ोसी जरूर रहा होगा, क्या गजब पकड़ रही होगी उसकी अध्यात्म और दार्शनिकता पर। वो जानता था कि कपड़े स्वभावतः स्वच्छ होते हैं, जैसे मनुष्य स्वभाव से निष्कपट/निर्दोष होते हैं। कुछ तत्व ऐसे हैं जो इंसान और वस्त्रों को मलिन कर देते हैं। यदि इन तत्वों को हटा दिया जाए तो कपड़े पुनः स्वच्छ हो सकते हैं। ये तो थी दार्शनिक सिद्धांत की बात। अब बात हुई कि आखिर इन अवांछित तत्वों को हटाया कैसे जाए।
यहाँ वैज्ञानिक को दार्शनिक के पड़ोसी होने का समुचित फायदा मिला। परिस्थितियों के भंवर में, घाट से घाट पटक खाकर, हिलोर कर कपड़े को स्वयं से ही तंग कर दो। कपड़ा बेचारा कहाँ जाएगा, अवांछित चीजें ही कपड़े को छोड़कर निकास मार्ग से निकल जाएंगी।
ये सिद्धांत और व्यवहार ऐसा कमाल बैठा कि फिर दुनिया में हर कपड़ा स्वच्छ होने लगा। कितना ही गंदा कपड़ा क्यों न हो, यंत्र में डाला, निकाला और ओढ लिया झिंगा लाला! हद तो तब हुई कि जब हमारे एक परिचित ने कहा कि…असल में उनकी चड्डी पीछे भारी हो जाया करती है! बंडल-बंडल अंतर्वस्त्र पड़े थे उनके गुसलखाने में, गंध ही गंध फैली होती। नए खरीद खरीदकर तंग आ चुके थे। फिर एक दिन उनकी मिसेज दिव्य धुलाई यंत्र खरीद लाई। अब उनके दिन फिर गए। इधर गंदे हुए कि उधर स्वच्छ होकर निकले! कोई बंडल नहीं बनाने, एकदम चालू खाता।
अगर आप स्वच्छ चाहते हैं तंत्र।
तो ले आइए दिव्य धुलाई यंत्र।।
अगर बजट है पुराने का, पर नए का हो अरमान।
दिव्य धुलाई यंत्र मिटाएगी, पिछले रातों के निशान।।














